पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पहले से जारी असंतोष के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का एक बयान नए राजनीतिक तूफान का कारण बन गया है. आसिफ ने कहा कि मीरपुर और रावलाकोट के निवासी “असली कश्मीरी” नहीं हैं क्योंकि वे पारंपरिक कश्मीरी भाषा के बजाय पोटोहारी और पहाड़ी बोलियां बोलते हैं. उनके इस बयान ने न केवल स्थानीय लोगों की भावनाओं को आहत किया, बल्कि पाकिस्तान की आधिकारिक कश्मीर नीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
बयान सामने आते ही मीरपुर, रावलाकोट और अन्य इलाकों में विरोध की आवाजें तेज हो गईं. स्थानीय नेताओं और सामाजिक संगठनों ने इसे लोगों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को कमजोर करने की कोशिश बताया. सोशल मीडिया पर भी रक्षा मंत्री की आलोचना हो रही है और कई लोगों ने इसे इस्लामाबाद की भेदभावपूर्ण सोच का उदाहरण बताया है.
पाकिस्तान की कश्मीर नीति पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान पाकिस्तान के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है. दशकों से पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह दावा करता रहा है कि पूरे जम्मू-कश्मीर की जनता उसकी सोच और दावों के साथ खड़ी है. ऐसे में रक्षा मंत्री का यह कथन उस दावे को कमजोर करता दिखाई देता है. आलोचकों का कहना है कि यदि PoK के बड़े हिस्से की आबादी को ही “असली कश्मीरी” नहीं माना जाता, तो पाकिस्तान की आधिकारिक दलीलों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है.
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब PoK के कई क्षेत्रों में महंगाई, बिजली संकट, बेरोजगारी और प्रशासनिक नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ रहा है. हाल के महीनों में कई जगहों पर प्रदर्शन और टकराव की घटनाएं भी देखने को मिली हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील समय में दिया गया यह बयान स्थानीय जनता और सरकार के बीच दूरी को और बढ़ा सकता है.
ख्वाजा आसिफ के बयान ने पाकिस्तान के भीतर पहचान, प्रतिनिधित्व और कश्मीर नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी है. आने वाले दिनों में यह मुद्दा न केवल PoK की राजनीति बल्कि पाकिस्तान की राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण असर डाल सकता है.
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