रांची. झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट स्वीकृत किया जाता है, लेकिन धरातल पर योजनाएं शुरू होने से पहले ही दम तोड़ती नजर आती हैं. सुदूर ग्रामीण इलाकों के मरीजों के लिए शुरू की गई बाइक एंबुलेंस योजना के पूरी तरह विफल होने के बाद, अब राज्य सरकार इसे बंद कर पंचायतों में आपातकालीन मरीज परिवहन वाहन (EPTV) वैन सेवा शुरू करने जा रही है.
इसके लिए प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए करीब 635 EPTV वैन खरीदने का खाका तैयार कर करोड़ों रुपये का नया बजट फूंकने की तैयारी है. ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि पुरानी कमियों को सुधारे बिना केवल नई योजना पर दांव लगाने से क्या प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी पर आ सकेगी?
नाकामी छिपाने को नई योजना, मॉनिटरिंग और जवाबदेही गायब
राज्य में पायलट प्रोजेक्ट के तहत शुरू की गई बाइक एंबुलेंस सेवा जमीनी स्तर पर खरी नहीं उतर सकी. स्वास्थ्य विभाग द्वारा गठित संयुक्त मूल्यांकन समिति की सिफारिश पर अब इसे बंद कर Emergency Patient Transport Vehicle (EPTV) सेवा लाने का निर्णय लिया गया है. इसके तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 445 और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को 190 EPTV वैन दी जाएंगी. हालांकि, मूल समस्या यह है कि योजनाओं की असफलता के पीछे की असली वजह – ढीला मॉनिटरिंग तंत्र, अधिकारियों की मनमानी और वित्तीय अनियमितता – पर कोई सख्त कदम नहीं उठाए जा रहे हैं.
राज्य के विभिन्न शहरों में विधायक व सांसद निधि से भी आनन-फानन में बाइक एंबुलेंस की खरीद की गयी. इसका उपयोग ग्रामीण इलाकों के लिए होना था, लेकिन अधिकांश बाइक एंबुलेंस विभिन्न कारणों से कबाड़ बन चुकी है. उनका उपयोग पूरी क्षमता से नहीं हो पाया.
कागजों में दावों की बौछार, धरातल पर मरीज लाचार
प्रदेश में मरीजों को राहत देने के उद्देश्य से पूर्व में शुरू की गई दर्जनों योजनाओं की वास्तविक स्थिति बेहद निराशाजनक है. 108 एंबुलेंस सेवा की बदहाली हो या दूरदराज के इलाकों में एंबुलेंस का न पहुंचना, हर जगह कुप्रबंधन हावी दिखता है. योजनाएं लाते समय जमीनी जरूरतों और तकनीकी शर्तों की अनदेखी की जाती है, जिसके कारण जनता के टैक्स का पैसा योजनाओं के मद में पानी की तरह बहाने के बाद भी परिणाम शून्य ही रहता है.
करोड़ों के नए बजटीय आवंटन पर गहराया संशय
EPTV वैन सेवा के अलावा विभाग 40 एडवांस लाइफ सपोर्ट (ALS) और 281 बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) एंबुलेंस खरीदने की भी तैयारी में है. टेंडर प्रक्रिया की जिम्मेदारी झारखंड मेडिकल हेल्थ डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन को सौंपी गई है. परंतु, वर्तमान प्रशासनिक कार्यशैली और विभागीय उदासीनता को देखते हुए इस बात पर गंभीर संशय है कि यह नई पहल कितनी कारगर साबित होगी. यदि क्रियान्वयन और जवाबदेही तय करने का ढांचा वही पुराना रहा, तो यह नई कवायद भी केवल बजट ठिकाने लगाने का माध्यम बनकर न रह जाए.
बिना इच्छाशक्ति के सुधार असंभव
झारखंड की स्वास्थ्य प्रणाली को नई घोषणाओं से ज्यादा एक मजबूत और पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत है. जब तक सरकारी मशीनरी में जवाबदेही और सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने की इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक EPTV वैन जैसी नई योजनाओं का लाभ भी अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना नामुमकिन है. सरकार को चाहिए कि नई खरीदारी से पहले पुरानी विसंगतियों को दूर करे और योजनाओं की सीधी ट्रैकिंग की व्यवस्था कायम करे.


