- सहरसा के डॉक्टर साहब का ‘मैजिकल टच’, मरीज की जगह पत्रकार पर आजमाया ‘फ्लो-फ्लो’ वाला नुस्खा!
प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान ने खुद आगे बढ़कर सोशल मीडिया की मशाल जलाई और डीएम साहब से सीधे-सीधे कार्रवाई की मांग कर डाली. संस्थान को खुद अपने रिपोर्टर के बचाव में ढाल बनकर खड़ा होना पड़ा, क्योंकि मामला सीधे तौर पर कलम की ताकत पर अस्पताल के सफेद कोट की गुंडागर्दी का था.
सहरसा. सदर अस्पताल में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की ‘धुलाई’ का एक ऐसा अनूठा दृश्य सामने आया है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानों अस्पताल परिसर में इलाज कम और मरीजों-पत्रकारों की सेहत बिगाड़ने का हुनर ज्यादा सिखाया जा रहा है. प्रभात खबर डिजिटल के रिपोर्टर अभिषेक कुमार जब अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभाने अस्पताल पहुंचे, तो वहां तैनात डॉक्टर एसके आजाद ने उन्हें किसी मरीज की तरह नहीं, बल्कि सीधे अपने अधिकार क्षेत्र के मातहत मानकर ऐसा ‘ट्रीटमेंट’ दिया कि पूरा प्रशासनिक अमला सकते में आ गया. डॉक्टर साहब ने पत्रकार को पहले तो अपना ‘बाप’ होने का शाश्वत ज्ञान दिया और जब रिपोर्टर ने इस अनोखे पारिवारिक रिश्ते पर आपत्ति जताई, तो उन्होंने ‘फ्लो-फ्लो में’ हाथ साफ करते हुए लोकतंत्र की ऐसी मालिश कर डाली कि उसका वीडियो सोशल मीडिया पर रातों-रात वायरल हो गया.
हैरानी की बात तो यह है कि जब राज्य में पत्रकारों की इज्जत का फलूदा बन रहा हो, तो मीडिया घरानों को भी अब खुलकर मैदान में उतरना पड़ता है. इस बार प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान ने खुद आगे बढ़कर सोशल मीडिया की मशाल जलाई और डीएम साहब से सीधे-सीधे कार्रवाई की मांग कर डाली. संस्थान को खुद अपने रिपोर्टर के बचाव में ढाल बनकर खड़ा होना पड़ा, क्योंकि मामला सीधे तौर पर कलम की ताकत पर अस्पताल के सफेद कोट की गुंडागर्दी का था.
डीएम ने ने ‘उच्चस्तरीय जांच समिति’ का गठन किया
लेकिन हमारे प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती भी किसी चमत्कार से कम नहीं है. सहरसा के डीएम दीपेश कुमार ने घटना का संज्ञान तो लिया और अपनी मुस्तैदी का परिचय देते हुए एक ‘उच्चस्तरीय जांच समिति’ का गठन भी कर दिया. यानी वीडियो सामने आने के बाद भी फौरी कार्रवाई के नाम पर फाइल को सीधे जांच के ठंडे बस्ते में सुरक्षित रख दिया गया है. जनता और मीडिया अब इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि यह जांच समिति कब अपनी रिपोर्ट सौंपेगी और तब तक डॉक्टर साहब अपने ‘फ्लो’ में और कितनों का इलाज कर चुके होंगे.
फिलहाल स्थिति यह है कि डॉक्टर साहब अपने बयान पर पर्दा डालने के लिए ‘फ्लो-फ्लो में हो गया’ जैसी दलीलें दे रहे हैं, तो वहीं प्रशासन जांच की अनन्त गहराइयों में गोता लगा रहा है. इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि अस्पताल में मरीजों का इलाज हो या न हो, लेकिन पत्रकारों के सब्र और लोकतंत्र की सेहत का ऑपरेशन यहां बेहद आसानी से किया जा सकता है. देखना यह है कि डीएम साहब की यह उच्चस्तरीय कमेटी इस ‘फ्लो’ को रोक पाती है या फिर मामला फाइलों की धूल में दफन होकर रह जाता है.


