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Home » नक्सली संगठन में 16 साल, खोखले वादे और जर्जरहाल परिवार के बीच फंसी एक प्रेम कहानी का ‘अंत’
झारखंड

नक्सली संगठन में 16 साल, खोखले वादे और जर्जरहाल परिवार के बीच फंसी एक प्रेम कहानी का ‘अंत’

SHOBHA SINGHBy SHOBHA SINGHAugust 8, 2026
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गिरफ्तार नक्सली
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सरायकेला/रांची. नक्सलवाद के रास्ते पर चलकर बेहतर भविष्य और परिवार को खुशहाली दिलाने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए दलमा के जंगलों से आई यह खबर एक बड़ी चेतावनी है. सुरक्षा बलों के संयुक्त ऑपरेशन में गिरफ्तार किए गए दो हार्डकोर नक्सलियों, मीना पहाड़िया और सागर सिंह सरदार की 16 वर्षों की साझा जिंदगी का अंत अब जेल की सलाखों के पीछे हुआ है.

यह सिर्फ दो नक्सलियों की गिरफ्तारी की कहानी नहीं है, बल्कि उस कड़वी हकीकत का पर्दाफाश है जहां संगठन में शामिल होने के सालों बाद भी नक्सलियों के अपने परिवार गुरबत और तंगी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

झूठे सपनों और प्रलोभनों का जाल

वर्षों पहले जब मीना पहाड़िया और सागर सिंह सरदार कम उम्र में नक्सली संगठन के संपर्क में आए थे, तब उन्हें एक सुनहरे भविष्य के बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए गए थे. संगठन के कैडरों ने उन्हें यह भरोसा दिलाया था कि नक्सल पथ पर चलने से न केवल समाज में बदलाव आएगा, बल्कि उनके परिवारों की गरीबी भी हमेशा के लिए दूर हो जाएगी. परिजनों को सरकारी नौकरी दिलाने, आर्थिक मदद पहुंचाने और घर की सभी जरूरतों को पूरा करने के लुभावने वादे किए गए थे. इन्हीं प्रलोभनों और बहकावे में आकर उन्होंने कम उम्र में ही बंदूक थाम ली और जंगलों का रास्ता चुन लिया.

नक्सली संगठन में जुड़ाव के बाद भी परिवार की जर्जर स्थिति

हालांकि, 16 सालों तक संगठन के लिए काम करने के बाद भी हकीकत इसके बिल्कुल उलट रही. मीना और सागर भले ही जंगलों में रहकर संगठन का विस्तार करते रहे और इसी दौरान दोनों के बीच प्रेम पनपा और उन्होंने शादी कर ली, लेकिन उनके घर वालों के हालात में रत्ती भर भी सुधार नहीं आया.

आज भी उनके परिजन अत्यंत जर्जर स्थिति में जीवन यापन करने को मजबूर हैं. मीना का परिवार जहां आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है और उसकी मां को पेट पालने के लिए जंगल से लकड़ियां चुनकर बेचनी पड़ रही हैं.

वहीं सागर का परिवार भी खेती और मजदूरी पर आश्रित होकर मुफ़लिसी का दौर झेल रहा है. संगठन की तरफ से परिवार को कोई आर्थिक या सामाजिक सहयोग नहीं मिला. जिस गरीबी और तंगी से छुटकारा पाने के लिए वे नक्सली बने थे, वह उनके पीछे छूटे परिवारों का पीछा कभी नहीं छोड़ सकी.

भविष्य पर गहराया संशय और अंधेरी राह

16 साल तक कानून से भागते-भागते आखिरकार नीमडीह थाना क्षेत्र के दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी की तराई से दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. जिस उम्र में इंसान अपने परिवार के साथ एक सुरक्षित और स्थिर जीवन बिताता है, उस उम्र में ये दोनों अब आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं.

यह कहानी साबित करती है कि नक्सलवाद की राह सिर्फ विनाश की ओर ले जाती है. संगठन में दिखाए जाने वाले वादे पूरी तरह खोखले होते हैं और सालों की वफादारी के बाद भी अंत में केवल अनिश्चित भविष्य, जेल की सलाखें और पीछे छूटे परिवार की बदहाली ही हाथ लगती है.

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मास कम्युनिकेशन की पृष्ठभूमि, डिजिटल मीडिया में गहराई से रुचि रखने वाली शोभा सिंह हिंदी न्यूज राइटर और OCEANPOST.IN की सब-एडिटर हैं. देश-दुनिया की हलचलों, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय खबरों को शब्दों के सही चयन और बेहतरीन संपादन (Editing) के जरिए पाठकों तक आसान भाषा में पहुंचा रहीं हैं.

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