रांची. झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और भ्रष्टाचार को लेकर जारी राजनीतिक और प्रशासनिक घमासान अब एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है. सीआईडी (CID) की टीम ने जेपीएससी और जेएसएससी मेधा घोटाले के मुख्य मास्टरमाइंड अभय तिवारी की पत्नी सुष्मिता तिवारी और भाई अक्षय तिवारी को गिरफ्तार कर लिया है. जांच में सामने आया कि रिश्वत और सेटिंग के बल पर सुष्मिता वित्त विभाग में और अक्षय महिला एवं बाल विकास विभाग में नौकरी हासिल करने में सफल रहे थे.
इस बड़ी कानूनी कार्रवाई के बीच, 24 दिनों से जारी छात्र आंदोलन के दबाव में आकर राज्य सरकार ने JSSC-CGL परीक्षा सहित विवादित एजेंसी TDPL द्वारा ली गई अन्य परीक्षाओं को रद करने की घोषणा कर दी है. सरकार के इस एकतरफा फैसले ने अब एक नया विवाद और संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया है.
जश्न के बीच बेरोजगारों का नया आंदोलन, निष्पक्ष मेरिट वालों पर गाज
सरकार द्वारा परीक्षा रद किए जाने की घोषणा के बाद एक तरफ जहां आंदोलनकारी अभ्यर्थियों ने जश्न मनाया, वहीं दूसरी तरफ पारदर्शी प्रक्रिया और अपनी मेहनत से चयनित होकर विभिन्न सरकारी विभागों में सेवा दे रहे लगभग 2,000 अभ्यर्थियों के भविष्य पर अचानक अंधेरा छा गया है.
अचानक नौकरी गंवाने वाले आक्रोशित युवाओं ने प्रोजेक्ट भवन के समक्ष प्रदर्शन करते हुए सरकार के इस निर्णय को दोहरा रवैया करार दिया है. अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार ने केवल एक पक्ष का राजनीतिक दबाव देखा और बिना किसी व्यक्तिगत जांच या संलिप्तता के उन सभी अभ्यर्थियों को सजा दे दी, जिन्होंने सालों की लगन से परीक्षा पास की थी.
सीबीआई जांच से क्यों कतरा रही सरकार?
सड़क पर उतरे अभ्यर्थियों का सबसे अहम सवाल यह है कि जब सीआईडी की जांच में एक-एक कर दोषियों के नाम उजागर हो रहे हैं और गिरफ्तारियां हो रही हैं, तो सरकार पूरे मामले की निष्पक्ष जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से क्यों नहीं कराती? अभ्यर्थियों का तर्क है कि पूरे तंत्र की सीबीआई जांच कराकर असली दोषियों को जेल भेजा जाना चाहिए, न कि पूरी परीक्षा रद कर मेरिट वाले अभ्यर्थियों की आजीविका छीनी जानी चाहिए.
क्या कहता है नया कानून और विधिक ढांचा
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी सार्वजनिक परीक्षा में गड़बड़ी की स्थिति में पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त करना अंतिम उपाय होना चाहिए:
- प्राकृतिक न्याय का हनन: संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (आजीविका का अधिकार) के तहत, सेवा में आ चुके कर्मियों को बिना सुनवाई का अवसर दिए (Audi Alteram Partem) बर्खास्त करना संवैधानिक नियमों के विपरीत है.
- चुनिंदा पृथक्कीकरण (Doctrine of Severability): नए सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार, जांच एजेंसियों का काम दोषी अभ्यर्थियों को अलग करना है, न कि निर्दोष और योग्य युवाओं की बलि चढ़ाना.
सीआईडी की गिरफ्तारियों और सरकार के एकतरफा फैसले के बीच अब पीड़ित अभ्यर्थियों ने अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए झारखंड उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल करने का निर्णय लिया है.


