सहायक मंडल अभियंता एन. भुमीनाथन और सहायक अभियंता टी. मुथुलक्ष्मी पर यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर राज्य की ‘दो-भाषा नीति’ (द्वि-भाषा नीति) का उल्लंघन किया था. देश के नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है कि क्या देश के सबसे बड़े हिस्से में बोली और समझी जाने वाली भाषा को इस तरह हाशिए पर धकेलना उचित है?
चेन्नई. देश की राजधानी से लेकर सुदूर दक्षिण तक, भाषा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. हाल ही में तमिलनाडु से एक बेहद चिंताजनक और गंभीर मामला सामने आया है, जिसने एक बार फिर देश की मुख्य पहचान और संपर्क भाषा के रूप में स्थापित हिंदी की उपेक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
थूथुकुडी जिले के सत्तांकुलम-नाज़रेथ राज्य मार्ग पर नविनिर्मित सूचना पट (साइन बोर्ड) पर स्थानों के नाम तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी लिखे जाने के कारण दो सरकारी इंजीनियरों को निलंबित कर दिया गया है.
मिली जानकारी के अनुसार, सहायक मंडल अभियंता एन. भुमीनाथन और सहायक अभियंता टी. मुथुलक्ष्मी पर यह कार्रवाई इसलिए की गई क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर राज्य की ‘दो-भाषा नीति’ (द्वि-भाषा नीति) का उल्लंघन किया था.
सरकार का तर्क है कि तमिलनाडु में केवल तमिल और अंग्रेजी का ही आधिकारिक कामकाज में उपयोग होता है और हिंदी इसमें शामिल नहीं है. जैसे ही यह मामला प्रशासन के संज्ञान में आया, आनन-फानन में दोनों अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया और सूचना पट से हिंदी के अंश को तुरंत हटा दिया गया.
क्या यह देश की मातृभाषा का अपमान है?
यह घटना सिर्फ दो इंजीनियरों के निलंबन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के भीतर हिंदी जैसी व्यापक रूप से बोली और समझी जाने वाली भाषा के साथ हो रहे दोयम दर्जे के व्यवहार का एक कड़वा सच बयां करती है. एक ओर जहां देश को सांस्कृतिक रूप से एकजुट करने और एक-दूसरे राज्यों के नागरिकों के बीच संवाद को सुगम बनाने के लिए एक साझा भाषा की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी ओर कुछ राज्यों में केवल राजनीतिक और भाषाई संकीर्णता के चलते हिंदी को इस प्रकार प्रताड़ित किया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है.
जब देश के किसी भी हिस्से में अन्य राज्यों से लोग सफर करते हैं या पर्यटन और व्यापार के सिलसिले में जाते हैं, तो हिंदी एक ऐसा माध्यम है जो उन्हें जोड़ती है. यदि हाइवे के सूचना पटों पर हिंदी में जानकारी लिख दी जाती है, तो इससे किसी भी स्थानीय भाषा का अपमान नहीं होता, बल्कि देश के अन्य कोनों से आने वाले नागरिकों को सुविधा मिलती है. इसके विपरीत, हिंदी को इस तरह से अपराध की श्रेणी में खड़ा करना और इसके उपयोग पर सरकारी कर्मचारियों पर गाज गिराना देश की बहुसंस्कृतिवाद और राष्ट्रीय एकता की भावना पर सीधा आघात है.
यह राष्ट्रव्यापी आत्ममंथन का विषय…
यह घटना देश के नीति-निर्माताओं और आम नागरिकों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है कि क्या देश के सबसे बड़े हिस्से में बोली और समझी जाने वाली भाषा को इस तरह हाशिए पर धकेलना उचित है? यदि देश के भीतर ही अपनी ही भाषा को स्थान पाने के लिए ऐसी बाधाओं का सामना करना पड़े, तो यह हमारी वैचारिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अखंडता के लिए एक गंभीर चेतावनी है.
समय आ गया है कि भाषा की राजनीति से ऊपर उठकर इस पर गंभीर आत्ममंथन किया जाए, ताकि किसी भी राज्य में देश की सांस्कृतिक पहचान और भाषा का इस प्रकार अपमान न हो.



