वर्जीनिया. महात्मा गांधी के परिवार से जुड़ी एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। अमेरिका में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते दिवंगत कानू गांधी और उनकी पत्नी शिवा गांधी की लगभग 30 एकड़ जमीन पर चल रहा 20 महीने लंबा कानूनी विवाद आखिरकार सुलझ गया है। अमेरिकी अदालत ने गांधी परिवार के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए वर्जीनिया के एक स्थानीय निवासी द्वारा किए गए अवैध कब्जे को हटाने का सख्त आदेश दिया है और इस पूरी जमीन का मालिकाना हक आधिकारिक तौर पर ट्रस्ट को वापस सौंप दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद अमेरिका के वर्जीनिया की वॉरेन काउंटी में स्थित शेनांडोआ नेशनल पार्क से सटी 30 एकड़ जमीन से जुड़ा हुआ है। इस बहुमूल्य जमीन को गांधी दंपति ने वर्ष 1987 में खरीदा था। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में दक्षिण गुजरात में रहने के दौरान कानू गांधी और उनकी पत्नी ने एक चैरिटेबल ट्रस्ट का गठन किया था और अपनी संपत्ति इस ट्रस्ट को सौंप दी थी। वर्तमान में सूरत के रहने वाले परिमल देसाई इस चैरिटेबल ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी के रूप में इस पूरी संपत्ति का कामकाज संभाल रहे हैं।
कानू गांधी और शिवा गांधी वर्ष 2013 में भारत लौट आए थे और नवंबर 2016 में सूरत में कानू गांधी का निधन हो गया था। उनकी वसीयत के अनुसार सारी संपत्ति उनकी पत्नी शिवा गांधी को मिली। इसके बाद शिवा गांधी ने वर्ष 2018 में ‘द डॉ. शिवा एंड कानू रामदास मोहनदास गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना की और अपनी वसीयत पंजीकृत कराई। वर्ष 2020 में उनके निधन के बाद वसीयत लागू हुई और परिमल देसाई ने मैनेजिंग ट्रस्टी के तौर पर कार्यभार संभाला।
कैसे जीता गया यह कानूनी मुकदमा?
इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत तब हुई जब 10 जनवरी 2025 को वर्जीनिया के एक स्थानीय नागरिक ग्रेगरी ब्लैक ने ‘एडवर्स पजेशन’ (प्रतिकूल कब्जे) के नियम के तहत इस जमीन पर अपना दावा ठोक दिया। इस नियम के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति किसी जमीन पर 15 साल तक कब्जा रखता है और कुछ शर्तें पूरी होती हैं, तो वह उसका मालिक बन सकता है।
मैनेजिंग ट्रस्टी परिमल देसाई ने इस चुनौती का डटकर मुकाबला करने का फैसला किया। उन्होंने अमेरिका में वकील नियुक्त किए और भारत से ही डिजिटल व तकनीकी संसाधनों का उपयोग करते हुए इस कानूनी लड़ाई को लड़ा। देसाई ने अपने बचाव में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और जीआईएस (GIS) मैप्स का प्रभावी इस्तेमाल किया। उन्होंने दस्तावेजों और उपग्रह नक्शों के जरिए यह साबित कर दिया कि वह केबिन पिछले 15 सालों से वहां मौजूद नहीं था, जिससे उस व्यक्ति का दावा पूरी तरह झूठा साबित हो गया। इसके अलावा, मौके पर एक अन्य महिला की मौजूदगी ने भी अवैध कब्जा करने वाले के दावों की हवा निकाल दी।
गांधीवादी विचारों के प्रसार में आएगी काम
अदालत में चली अंतिम सुनवाइयों के बाद न्यायाधीश ने गांधी परिवार के हक में फैसला सुनाया। ट्रस्टी परिमल देसाई ने कोर्ट को यह भी स्पष्ट किया कि इस संपत्ति को दान करने का मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी के विचारों और आदर्शों का प्रचार-प्रसार करना है।
20 महीनों की लंबी और कड़ी मशक्कत के बाद मिली इस जीत से गांधी परिवार और उनके अनुयायियों में खुशी की लहर है। इस फैसले से न सिर्फ एक विदेशी जमीन पर अवैध कब्जाधियो के मंसूबे नाकाम हुए हैं, बल्कि गांधी जी की विरासत से जुड़ी इस महत्वपूर्ण संपत्ति का नियंत्रण भी सही हाथों में सुरक्षित हो गया है।


