हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची के उस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसमें एक मृतक यात्री के परिजनों की याचिका को खारिज कर दिया गया था. इसके साथ ही अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया है कि वह मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये का मुआवजा दे.
रांची. झारखंड हाईकोर्ट ने ट्रेन दुर्घटनाओं से जुड़े मुआवजों के मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और मानवीय फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि ट्रेन से गिरकर किसी यात्री की मौत होने पर केवल इस आधार पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके पास से रेलवे टिकट बरामद नहीं हुआ था.
हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक मृतक यात्री के परिजनों की याचिका को खारिज कर दिया गया था. इसके साथ ही अदालत ने रेलवे को निर्देश दिया है कि वह मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये का मुआवजा दे.
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा मामला पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा क्षेत्र के रहने वाले बनमाली गोप की दुर्घटना से जुड़ा है. परिजनों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 1 सितंबर 2017 को बनमाली गोप झींकपानी रेलवे स्टेशन से केंडपोसी जाने के लिए टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए थे. उनके भाई हरीश गोप ने स्टेशन पर उन्हें छोड़ने के साथ ही उनकी यात्रा के लिए विधिवत टिकट भी खरीदा था.
यात्रा के दौरान ट्रेन के डिब्बे में काफी भीड़ थी, जिसके कारण बनमाली गोप डिब्बे के भीतर खड़े होकर यात्रा कर रहे थे. जैसे ही ट्रेन केंडपोसी स्टेशन के करीब पहुंची, उतरने वाले यात्रियों की भारी भीड़ और धक्का-मुक्की के बीच ट्रेन को एक तेज झटका लगा. इसी अचानक झटके के कारण उनका संतुलन बिगड़ गया और वे चलती ट्रेन से नीचे गिर पड़े, जिससे मौके पर ही उनकी दर्दनाक मौत हो गई.
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती
दुर्घटना के बाद जब शव की तलाशी ली गई, तो मौके से रेलवे टिकट बरामद नहीं हुआ. इसी तकनीकी कमी को आधार बनाते हुए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, रांची ने 12 सितंबर 2023 को दिए अपने फैसले में बनमाली गोप को वैध टिकट के साथ यात्रा करने वाला वास्तविक यात्री मानने से इनकार कर दिया और उनके परिजनों (पत्नी बैजंती गोप, मां जेमा गोदिन और दो नाबालिग बच्चों) की मुआवजा याचिका खारिज कर दी. ट्रिब्यूनल के इस आदेश के खिलाफ मृतक के परिजनों ने झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने इस मामले की सुनवाई की.
अदालत की मुख्य टिप्पणियां और फैसला
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि रेलवे यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि मृतक की मौत किसी ऐसी कानूनी परिस्थिति के तहत हुई थी जो मुआवजे के दायरे से बाहर हो. अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि रेलवे की ओर से नियमों (रेलवे पैसेंजर अनटुवर्ड इंसीडेंट्स की जांच की प्रक्रिया नियम, 2003) के तहत आवश्यक डीआरएम रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई थी.
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल टिकट नहीं मिलने या गवाही से जुड़ी छोटी-मोटी तकनीकी बातों को आधार बनाकर न्याय के वास्तविक उद्देश्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. ट्रिब्यूनल ने मामलों की परिस्थितियों और साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन किए बिना अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया था, जो उचित नहीं था.
आश्रितों को राहत, 8 लाख का मुआवजा और ब्याज
झारखंड हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए मृतक के परिजनों की अपील स्वीकार कर ली. अदालत ने रेलवे अधिनियम की धारा 124-ए के तहत मृतक के आश्रितों को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है. इस राशि पर आवेदन दाखिल करने की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देय होगा.
इस महत्वपूर्ण फैसले से मृतक की पत्नी, मां और दो छोटे बच्चों को बड़ी कानूनी राहत मिली है और यह फैसला देश भर के ऐसे अन्य मामलों के लिए एक बड़ा कानूनी दृष्टांत साबित होगा.


