कोलकाता. पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सांसद नागेंद्र राय alias अनंत महाराज से राज्य का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘बंग विभूषण’ वापस लेने का फैसला महज एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसके पीछे राज्य की राजनीतिक और सांस्कृतिक समीकरण छिपे हुए हैं. खबरों के अनुसार, स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज को लेकर दिए गए विवादित बयान के बाद यह कड़ा कदम उठाया गया है.
बंगाली अस्मिता और नेताजी का भावनात्मक जुड़ाव
पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘बंगाली अस्मिता’ और राज्य के महान नायकों का सम्मान हमेशा से चुनावी और सांस्कृतिक केंद्रबिंदु रहा है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस राज्य के हर नागरिक के दिल में एक विशेष स्थान रखते हैं. उन पर की गई किसी भी नकारात्मक या आपत्तिजनक टिप्पणी को बंगाल की जनता और राजनीतिक दल जनभावनाओं के खिलाफ मानते हैं. यही कारण है कि इस मुद्दे पर सरकार ने त्वरित और सख्त रुख अपनाया, ताकि जनता को बंगाली गौरव और महानायकों के प्रति शून्य-सहनशीलता (Zero Tolerance) का स्पष्ट संदेश दिया जा सके.
उत्तर बंगाल और राजबंशी वोट बैंक का समीकरण
अनंत महाराज केवल एक सांसद ही नहीं, बल्कि उत्तर बंगाल के प्रभावशाली राजबंशी समुदाय के प्रमुख चेहरों में से एक हैं. उत्तर बंगाल के चुनावी नतीजों में राजबंशी मतदाताओं की भूमिका बेहद निर्णायक मानी जाती है. ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार द्वारा फरवरी 2026 में उन्हें ‘बंग विभूषण’ देना इसी सामाजिक-राजनीतिक जुड़ाव का हिस्सा माना गया था.
हालांकि, अब सम्मान वापस लिए जाने से उत्तर बंगाल के क्षेत्रीय राजनीति में एक नया मोड़ आ गया है, जहां भाजपा और टीएमसी दोनों ही राजबंशी समुदाय को साधने की होड़ में हैं.
राजनीतिक दलों के बीच घमासान और दबाव
इस विवाद के सामने आते ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने भाजपा पर तीखा हमला बोला और इसे नेताजी व बंगाल के इतिहास का अपमान करार दिया. दूसरी ओर, विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए भाजपा की प्रदेश इकाई ने भी अनंत महाराज के बयान से दूरी बना ली और इसे उनका निजी विचार बताया.
पश्चिम बंगाल की सियासत में जब भी राज्य के महान नायकों के सम्मान पर बात आती है, तो राजनीतिक बयानबाजी और दलगत निष्ठाएं पीछे छूट जाती हैं. ‘बंग विभूषण’ वापस लेने का फैसला न केवल यह दर्शाता है कि नेताजी से जुड़ी भावनाएं बंगाल की राजनीति की दिशा तय करती हैं, बल्कि इसने आने वाले समय में उत्तर बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को भी गरमा दिया है.


