रांची. JSSC-CGL परीक्षा रद्द किए जाने के झारखंड सरकार के फैसले के बाद राज्य भर के निष्पक्ष और अपनी मेहनत से सफल हुए अभ्यर्थियों में भारी आक्रोश व्यापत है. रांची के प्रोजेक्ट भवन में विरोध दर्ज करा रहे युवाओं का कहना है कि सरकार का यह कदम पूरी तरह से ‘दोहरा रवैया’ दर्शाता है. एक तरफ जहां सरकार आंदोलनकारी धड़े के दबाव में आकर पूरी परीक्षा निरस्त कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक मेरिट और निष्पक्षता से चयनित अभ्यर्थियों को बिना जांच के सजा दी जा रही है.
सीबीआई (CBI) जांच की मांग और सरकार का दोहरा रवैया
विरोध प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि परीक्षा में धांधली या पेपर लीक के आरोप हैं, तो सरकार इसकी निष्पक्ष जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने से क्यों बच रही है?
अहम सवाल
सच सामने लाने से परहेज क्यों: अभ्यर्थियों का तर्क है कि पूरी चयन प्रक्रिया को निरस्त कर देना किसी समस्या का समाधान नहीं है. यदि सरकार सच में पारदर्शिता चाहती है, तो पूरे मामले को सीबीआई (CBI) को सौंपना चाहिए ताकि असल दोषियों, शिक्षा माफिया और अनुचित साधनों का प्रयोग करने वालों की पहचान कर उन्हें जेल भेजा जा सके.
मेरिट वालों के साथ सरासर अन्याय: अपनी लगन और सालों की मेहनत से परीक्षा पास कर विभागों में अपनी सेवा दे चुके अभ्यर्थियों का कहना है कि सरकार का निर्णय दोहरे मापदंडों पर आधारित है. केवल आंदोलन के राजनीतिक दबाव में आकर बिना किसी जांच के पूरी नियुक्ति को रद्द कर देना उन अभ्यर्थियों के अधिकारों का हनन है, जो बिना किसी धांधली के मेरिट सूची में आए थे.
प्राकृतिक न्याय और नए विधिक ढांचे के तहत प्रश्न
कानूनी जानकारों के अनुसार, किसी भी भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायत पर पूरी परीक्षा को रद्द करना अंतिम विकल्प होना चाहिए:
- चुनिंदा पृथक्कीकरण (Doctrine of Severability): भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय प्रशासनिक व्यवस्था और नए सार्वजनिक परीक्षा कानूनों का मूल सिद्धांत यह है कि पहले ‘दूध और पानी’ को अलग किया जाए. जांच एजेंसियों का काम निर्दोष अभ्यर्थियों को दोषी तत्वों से अलग करना होता है, न कि सभी पर गाज गिराना.
- सीबीआई जांच ही एकमात्र पारदर्शी विकल्प: राज्य पुलिस या प्रशासनिक स्तर पर जांच को अधूरा छोड़ पूरी प्रक्रिया निरस्त करने से संदेह बना रहता है. निष्पक्ष अभ्यर्थियों की मांग है कि सीबीआई जांच से ही सच सामने आ सकता है और केवल दोषियों पर कार्रवाई कर सही मेरिट वाले छात्रों को उनका हक वापस मिलना चाहिए.
सफल अभ्यर्थियों ने चेतावनी दी है कि सरकार का यह एकतरफा फैसला न केवल प्रशासनिक विश्वसनीयता को खत्म करता है, बल्कि मेहनती युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है. अपनी आजीविका और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे जल्द ही उच्च न्यायालय में अपनी रिट याचिका दाखिल करेंगे.


