नई दिल्ली.
भारत का दक्षिण-पश्चिमी तटीय राज्य ‘केरल’ जल्द ही आधिकारिक तौर पर अपने पारंपरिक नाम ‘केरलम’ के रूप में जाना जाएगा. लोकसभा ने राज्य का नाम बदलने वाले विधेयक को सर्वसम्मति और ध्वनि मत से पारित कर दिया है. इस कदम का मुख्य उद्देश्य राज्य की सदियों पुरानी सांस्कृतिक, भाषाई और ऐतिहासिक पहचान को आधिकारिक दस्तावेज में पुनर्स्थापित करना है.
नाम बदलने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
केरल विधानसभा ने अगस्त 2023 और फिर जून 2024 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से राज्य का नाम बदलने का अनुरोध किया था. मलयालम भाषा में इस भूभाग को हमेशा से ‘केरलम’ ही कहा जाता रहा है. हालांकि, अंग्रेजी भाषा और भारतीय संविधान की पहली अनुसूची में इसे ‘केरल’ के रूप में दर्ज किया गया था. इस भाषाई अंतर को दूर करने और स्थानीय सांस्कृतिक भावना का सम्मान करने के लिए ही नाम परिवर्तन का यह कदम उठाया गया है.
नाम के पीछे की ऐतिहासिक व भाषाई जड़ें
‘केरलम’ शब्द की ऐतिहासिक प्रासंगिकता बेहद गहरी है:
- प्राचीन साक्ष्य: इस नाम का सबसे पहला लिखित प्रमाण ईसा पूर्व 257 के सम्राट अशोक के दूसरे शिलालेख में मिलता है, जहाँ इस क्षेत्र के शासकों को ‘केरलपुत्र’ (चेर राजवंश) कहा गया है.
- भाषाई उत्पत्ति: भाषाविदों के अनुसार, यह शब्द कन्नड़ या पुरानी तमिल के मूल शब्दों से मिलकर बना है. ‘चेर’ या ‘केरम’ का अर्थ जुड़ना या तटीय क्षेत्र होता है और ‘अलम’ का अर्थ भूमि या क्षेत्र होता है.
त्रावणकोर-कोचीन से आधुनिक राज्य तक का सफर
ऐतिहासिक रूप से मलयालम भाषी आबादी त्रावणकोर, कोचीन और मद्रास प्रेसीडेंसी के मालाबार क्षेत्र में विभाजित थी. 1920 के दशक में ‘ऐक्य केरल’ (संयुक्त केरल) आंदोलन के जरिए इन्हें एक करने की मांग उठी. 1949 में त्रावणकोर और कोचीन को मिलाकर एक राज्य बना. इसके बाद, सैयद फजल अली की अध्यक्षता वाले राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1 नवंबर 1956 को भाषाई आधार पर आधुनिक राज्य का गठन हुआ, जिसे स्थानीय तौर पर ‘केरलम’ ही कहा गया.
नाम परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया
संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को किसी भी राज्य का नाम बदलने का अधिकार है. प्रक्रिया के तहत: केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी (जो फरवरी में मिली) के बाद राष्ट्रपति ने इस विधेयक को राज्य विधानसभा के विचारार्थ भेजा. विधानसभा की सहमति के बाद इसे संसद में पेश किया गया. लोकसभा से पारित होने के बाद, अब इस विधेयक को कानून का रूप लेने के लिए राज्यसभा की मंजूरी और राष्ट्रपति के अंतिम हस्ताक्षर की आवश्यकता होगी.


