- मरीजों की लाचारी, बेबसी और सरकारी सुविधा का अंतहीन इंतजार, जाने बिहार के स्वास्थ्य तंत्र का कड़वा सच
पटना: सरकारी अस्पतालों की चौखट पर उम्मीद लेकर पहुंचने वाले गरीबों और बुजुर्गों के लिए बेहतर इलाज का सपना आज भी एक कठिन संघर्ष बना हुआ है. कागजों पर स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण और करोड़ों रुपये की योजनाओं के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर मरीज लाचारी और बेबसी के साए में दिन काटने को मजबूर हैं.
आयुष्मान भारत: कार्ड हाथ में, पर इलाज का इंतजार
70 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्गों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त इलाज का भरोसा देने वाली ‘आयुष्मान भारत’ योजना इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रही है. निजी अस्पतालों का करीब 1000 करोड़ रुपये का बकाया अटका हुआ है, जिसके चलते 1.5 लाख से अधिक क्लेम फाइलों पर धूल जम रही है.
भुगतान न मिलने से नाराज सूचीबद्ध निजी अस्पतालों ने नए मरीजों की भर्ती और इलाज में हाथ खड़े कर दिए हैं. स्थिति यह है कि मरीज हाथ में आयुष्मान कार्ड लिए एक दर से दूसरे दर की ठोकरें खा रहे हैं, लेकिन उन्हें निजी केंद्रों से मायूसी ही हाथ लग रही है.
सरकारी अस्पतालों पर बढ़ा बोझ, हफ्तों की वेटिंग
निजी सेंटरों से लौटाए जा रहे मरीजों का पूरा दबाव अब IGIMS, PMCH और NMCH जैसे बड़े सरकारी अस्पतालों पर आ गया है. इसके परिणामस्वरूप, जो इलाज तुरंत मिलना चाहिए, उसके लिए मरीजों को महीनों इंतजार करना पड़ रहा है:
- डायलिसिस के लिए चार सप्ताह की तारीख: वैशाली से आए एक गंभीर मरीज को जब निजी अस्पताल ने कैशलेस इलाज देने से मना कर दिया, तो वे मजबूरन सरकारी अस्पताल पहुंचे. वहां जांच के बाद उन्हें चार हफ्ते बाद की तारीख थमा दी गई.
- ऑपरेशन के लिए 25 दिन की लाचारी: मसीढ़ी की एक बुजुर्ग महिला, जिनका कूल्हा गिरकर टूट गया था, उन्हें इमरजेंसी के बावजूद सर्जरी के लिए 25 दिनों का इंतजार करने को कहा गया है.
सिस्टम की तकनीकी गड़बड़ी बनी मुसीबत
अधिकारियों का कहना है कि पिछले दो महीनों में ‘सिस्टम स्विच’ और तकनीकी खामियों के कारण भुगतान में रुकावट आई थी, जिसे अब धीरे-धीरे दुरुस्त किया जा रहा है.
हालांकि, प्रशासनिक सफाई अपनी जगह है, लेकिन सवाल यह उठता है कि सिस्टम की इस ढिलाई की कीमत बेबस मरीज अपनी जान जोखिम में डालकर क्यों चुकाएं? जब तक फंड का अटकाव खत्म नहीं होता और सरकारी व्यवस्थाएं मजबूत नहीं की जातीं, तब तक आम जनता के लिए ‘मुफ्त और त्वरित इलाज’ महज एक सरकारी वादा ही बना रहेगा.
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