- संवेदनशील पदों पर तबादलों का नियम सिर्फ कागजों में रह गया
कोलकता/चक्रधरपुर. भारतीय रेलवे के नियम-कायदे शायद आम कर्मचारियों के लिए ही बने हैं, क्योंकि चक्रधरपुर रेल मंडल में तो ‘साहब’ की मर्जी ही सबसे बड़ा कानून नजर आ रही है. रेलवे बोर्ड के सख्त दिशानिर्देशों और संवेदनशील (सेंसिटिव) पदों पर तबादले के तय ट्रांसफर नियमों को दरकिनार करते हुए चक्रधरपुर मंडल रेल प्रबंधकीय तंत्र ने अपनी ही एक अलग ‘सुलभ व्यवस्था’ बना ली है। ताजा मामला अमित चौधरी को गुड्स का ‘प्रभारी’ बनाए जाने का है, जिसने मंडल के गलियारों से लेकर मुख्यालय तक चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
नियमों की उड़ती धज्जियां और व्यंग्यात्मक ‘विशेषाधिकार’
रेलवे बोर्ड बार-बार यह सर्कुलर जारी करता है कि संवेदनशील पदों पर एक निश्चित अवधि से अधिक समय तक किसी अधिकारी या कर्मचारी को न रखा जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे. लेकिन चक्रधरपुर में सीनियर डीसीएम की ‘दरियादिली’ के आगे बोर्ड के आदेश सिर्फ कागजी पुलिंदे साबित हो रहे हैं. आखिर ऐसी क्या मजबूरी या ‘खास वजह’ है कि पूरे मंडल में सीनियर डीसीएम को कुछ चुनिंदा चेहरे ही बेहद काबिल और भरोसेमंद नजर आते हैं?
जब भी अहम और मलाईदार पदों पर जिम्मेदारी देने की बात आती है, तो नियमों का ताक पर रखा जाना तय माना जाता है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या ‘विशेषाधिकार’ का दायरा नियमों से भी ऊपर हो गया है? या फिर चक्रधरपुर में सीनियर डीसीएम को यह छूट मिली हुई है कि वे जब चाहें, जिसे चाहें, नियमों को ठेंगा दिखाते हुए मनचाही कुर्सी पर बैठा दें?
सतर्कता (VIGILANCE) विभाग, अब ‘कागजी शेर’?
इस पूरे घटनाक्रम में रेलवे का विजिलेंस (सतर्कता) विभाग खुद सवालों के कटघरे में खड़ा है. विजिलेंस की रिपोर्ट और अनुशंसाओं की धज्जियां जिस तरह चक्रधरपुर में उड़ाई जा रही हैं, उससे तो यही लगता है कि विजिलेंस सिर्फ छोटे कर्मचारियों पर धौंस जमाने के लिए रह गया है.
चौंकाने वाली बात यह है कि विजिलेंस विभाग की ही अनुशंसा पर जिन लगभग एक दर्जन कर्मचारियों को बेहद गंभीर आरोपों के चलते संवेदनशील पदों से हटाया गया था, उन्हें महज तीन महीने के भीतर वापस उन्हीं मलाईदार पोस्टिंग पर बहाल कर दिया गया. आखिर यह कौन सा जादू का चिराग है? विजिलेंस की जांच, उसकी रिपोर्ट और उसकी अनुशंसा का क्या यही मोल रह गया है कि तीन महीने बाद उसे रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाए?
जीएम, पीसीसीएम और एसडीजीएम की ‘रहस्यमयी’ खामोशी
यह पूरा खेल सिर्फ चक्रधरपुर मंडल तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण पूर्व रेलवे (SER) मुख्यालय गार्डन रीच की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।
एसडीजीएम (SDGM) और सतर्कता तंत्र: सीनियर डिप्टी जनरल मैनेजर (SDGM), जो विजिलेंस के प्रमुख होते हैं, उनकी सिफारिशों को जब एक मंडल का अधिकारी हवा में उड़ा देता है, तो वे खामोश क्यों रहते हैं?
पीसीसीएम (PCCM): प्रधान मुख्य वाणिज्य प्रबंधक (PCCM), जो कमर्शियल विभाग के मुखिया हैं, उनके संज्ञान में यह मनमानी होने के बावजूद वे मूकदर्शक क्यों बने हुए हैं?
जनरल मैनेजर (GM): जोन के सर्वेसर्वा जीएम साहब की नाक के नीचे ट्रांसफर पॉलिसी और सतर्कता नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ रही हैं, लेकिन इस ‘अवैध वीआईपी कल्चर’ और विशेषाधिकार के दुरुपयोग को रोकने में वे पूरी तरह अप्रभावी नजर आ रहे हैं।
आखिर किस ‘रूल बुक’ से चल रहा है चक्रधरपुर मंडल?
रेलवे की पारदर्शी कार्यप्रणाली पर यह एक बड़ा धब्बा है कि विजिलेंस द्वारा दागी या हटाए गए कर्मियों को बिना किसी ठोस कारण के तीन महीने में ही पुनः पदस्थापित कर दिया जाता है. यदि मंडल स्तर पर अधिकारी ही रेलवे बोर्ड की गाइडलाइन्स को खारिज करने लगेंगे, तो विजिलेंस जैसी संस्थाओं की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाएगी.
अब देखना है कि रेल मंत्रालय और विजिलेंस का शीर्ष नेतृत्व इस ‘मनमानी’ पर कोई लगाम लगाता है या फिर चक्रधरपुर में नियमों को ठेंगा दिखाने का यह ‘खेल’ यूं ही बेरोक-टोक चलता रहेगा.
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