आजादी के 80वें वर्ष के जश्न के ठीक बीच उठा यह विवाद यह साबित करता है कि देश में राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्कृति से जुड़े मुद्दे आज भी मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र बने हुए हैं. एक तरफ जहां कांग्रेस इसे बीजेपी की राजनीतिक बयानबाजी और ‘तिल का ताड़ बनाने’ की कोशिश बता रही है, वहीं बीजेपी इसे देश की राष्ट्र भावना और संविधान के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता पर एक बड़ा सवालिया निशान मान रही है.
नई दिल्ली. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में झंडोत्तोलन कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के गायन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब एक राजनीतिक संग्राम में तब्दील हो चुका है. सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के बीच इस मुद्दे पर तीखे बयानों के बाण चल रहे हैं, जिससे देश की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रीय प्रतीकों और भावनाओं का सम्मान एक बड़ा चुनावी और वैचारिक मुद्दा बन गया है.
विवाद की शुरुआत और कांग्रेस की सफाई
यह पूरा विवाद तब भड़का जब 15 अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम’ का गायन चल रहा था. इस बीच पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं के हावभाव और आपसी बातचीत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया. वीडियो में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की मुद्रा को लेकर बीजेपी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेताओं ने राष्ट्रीय गीत का अपमान किया है.
मामले की गंभीरता को भांपते हुए कांग्रेस सांसद तारिक अनवर ने तुरंत पार्टी की ओर से सफाई पेश की. उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पूरे मामले को ‘राई का पहाड़’ बनाया जा रहा है. तारिक अनवर के मुताबिक, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भीषण गर्मी और धूप में करीब 15 मिनट से लगातार खड़े थे, और उनकी उम्र को देखते हुए सोनिया गांधी उनके बैठने के लिए कुर्सी का प्रबंध करने को कह रही थीं. कांग्रेस का यह तर्क था कि यह केवल एक प्रशासनिक और मानवीय औपचारिकता थी, न कि राष्ट्रगीत के प्रति अनादर.
बीजेपी का कड़ा पलटवार, ‘नक्सली मानसिकता’ का आरोप
कांग्रेस की इस सफाई से संतुष्ट होने के बजाय बीजेपी ने इसे आक्रामक रूप से लपक लिया. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पार्टी पर जोरदार हमला बोलते हुए तीखे सवाल दागे. उन्होंने कहा कि अगर सिर्फ कुर्सी की ही बात थी, तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी के चेहरे पर असहजता और गुस्सा क्यों झलक रहा था?
प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस पर सीधा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि आज की कांग्रेस पार्टी ‘नक्सली मानसिकता’ से ग्रसित हो चुकी है और अब यह पुरानी ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ नहीं रही. बीजेपी नेताओं का यह भी कहना है कि कांग्रेस के भीतर कई नेता ऐसे हैं जो वैचारिक कारणों से राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण सम्मान से कतराते हैं.
क्या कहता है ‘वंदे मातरम’ पर नया कानून?
इस राजनीतिक रार के बीच अब यह चर्चा भी जोर पकड़ने लगी है कि क्या यह विवाद केवल बयानों और सोशल मीडिया की जंग तक सीमित रहेगा या फिर कानूनी गलियारों तक पहुंचेगा. जानकारों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रगान-राष्ट्रगीत के अपमान से जुड़े मामलों को लेकर देश में कानून पहले से ही सख्त हैं.
संसद द्वारा पारित कानूनों और गृह मंत्रालय के नए दिशा-निर्देशों के तहत, आधिकारिक समारोहों में ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान ही कानूनी सुरक्षा प्राप्त है. यदि किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में जानबूझकर राष्ट्रगीत के गायन में बाधा डाली जाती है या इसका अनादर किया जाता है, तो यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ सकता है.
विरोधी दलों या सामाजिक संगठनों द्वारा इस मामले में कानूनी शिकायत, जनहित याचिका (PIL) या आपराधिक मानहानि जैसी कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है. अदालतें इस बात की जांच कर सकती हैं कि यह घटना महज़ एक प्रशासनिक समन्वय की कमी थी या इसके पीछे राष्ट्रगीत के प्रति जानबूझकर बरती गई उदासीनता थी.
आजादी के 80वें वर्ष के जश्न के ठीक बीच उठा यह विवाद यह साबित करता है कि देश में राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्कृति से जुड़े मुद्दे आज भी मुख्यधारा की राजनीति का केंद्र बने हुए हैं. एक तरफ जहां कांग्रेस इसे बीजेपी की राजनीतिक बयानबाजी और ‘तिल का ताड़ बनाने’ की कोशिश बता रही है, वहीं बीजेपी इसे देश की राष्ट्र भावना और संविधान के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता पर एक बड़ा सवालिया निशान मान रही है. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह राजनीतिक टकराव केवल बयानों तक सीमित रहता है या कानूनी दांव-पेंच का रूप ले लेता है.


