मुंबई. सत्र अदालत ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के सात छात्रों को राहत देते हुए अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है. अदालत ने सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी में कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के दिवंगत प्रोफेसर जी. एन. साईबाबा को श्रद्धांजलि देने वाले कार्यक्रम में भाग लेना या माओवादी लेखकों की किताबें डाउनलोड करना अपने आप में कोई अपराध नहीं है.
क्या है पूरा मामला
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के परिसर में प्रोफेसर जी. एन. साईबाबा की पहली पुण्यतिथि पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. पुलिस का आरोप था कि यह कार्यक्रम बिना किसी पूर्व अनुमति के आयोजित किया गया था और इसमें विवादास्पद नारे लगाए गए थे. इस मामले में पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज किए जाने के बाद संस्थान के नौ छात्रों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए मुंबई की सत्र अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की थी.
अदालत की टिप्पणी
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी. बी. बोहरा ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि प्रो. साईबाबा (जिन्हें अदालत द्वारा यूएपीए के आरोपों से बरी किया जा चुका था) की याद में श्रद्धांजलि सभा आयोजित करना या माओवादी विचारधारा का साहित्य पढ़ना गैर-कानूनी गतिविधि के दायरे में नहीं आता. कोर्ट के अनुसार, केवल किसी प्रकार का साहित्य डाउनलोड करना या रखना तब तक अपराध नहीं बनता जब तक कि उसके जरिए किसी अवैध गतिविधि या हिंसा को बढ़ावा न दिया जा रहा हो.
हालांकि, अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि शैक्षणिक परिसरों का उपयोग ऐसे मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए जहां कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले नारे लगाए जाएं.
2 छात्रों की जमानत याचिका क्यों हुई खारिज
अदालत ने 7 छात्रों को जमानत दे दी, लेकिन दो छात्रों अभिरूप पॉल (32) और कामख्या दास (23) की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया.
अभियोजन पक्ष की ओर से कोर्ट में निम्नलिखित तर्क दिए गए:
- अभिरूप पॉल: पुलिस का दावा है कि उनके डिजिटल उपकरणों में सीपीआई (माओवादी) से जुड़ी सामग्री पाई गई और कुछ डेटा को डिलीट करने का प्रयास किया गया. इसके अतिरिक्त, पॉल पर प्रतिबंधित विचारों से प्रभावित क्षेत्रों में फील्डवर्क करने का आरोप है, जिसके लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक मानी गई.
- कामख्या दास: इनके मामले में भी असहयोग, संदिग्ध सामग्री मिटाने और जांच अधिकारी को कथित रूप से धमकाने के आरोप सामने आए हैं.
कोर्ट ने इन दोनों मामलों में माना कि सामग्री की प्रकृति, संभावित संबंधों और मंशा की गहन जांच के लिए पुलिस को हिरासत में पूछताछ का अधिकार मिलना जरूरी है.


