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Home » लोकतंत्र में विरोध का अधिकार, लेकिन कानून का रहे राज, …दिल्ली प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश
देश/दुनिया

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार, लेकिन कानून का रहे राज, …दिल्ली प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा संदेश

Ocean News DeskBy Ocean News DeskJuly 28, 2026
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नई दिल्ली. 

देश भर में छात्रों और विभिन्‍न संगठनों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों और दिल्ली सहित कई राज्यों में हुई हिंसा की घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हुए साफ किया है कि कानून-व्यवस्था को हाथ में लेने वाले उपद्रवियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.

1. सड़क पर उपद्रव बर्दाश्त नहीं, कानून अपने हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा पर कड़ा रुख अपनाया है. अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि लोकतंत्र में अपनी मांगों के लिए आवाज उठाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसकी आड़ में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, पुलिस पर हमले करना या कानून-व्यवस्था को ठप कर देना कतई स्वीकार्य नहीं है. जिन लोगों ने भी विरोध की आड़ में हिंसा फैलाई है या अराजकता पैदा की है, उनके खिलाफ कानून के तहत कठोरतम कदम उठाए जाने चाहिए.

2. ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन में उपद्रवियों की घुसपैठ’, दिल्ली हिंसा पर तीखी नजर

अदालत ने पुलिस प्रशासन के उस तर्क को भी संज्ञान में लिया कि अक्सर शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुए आंदोलनों में उपद्रवी तत्व घुस आते हैं और भीड़ का फायदा उठाकर हिंसा भड़काते हैं. दिल्ली और अन्य राज्यों में हुई घटनाओं के संदर्भ में कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह एक हाई-पावर्ड कमिटी बनाने का आदेश देगा, जो इन हिंसक घटनाओं के मूल कारणों और इसमें शामिल तत्वों की गहराई से जांच करेगी. यह उन असामाजिक तत्वों के लिए एक सीधी चेतावनी है जो छात्रों या आम जनता के कंधों पर बंदूक रखकर अपनी राजनीतिक या असामाजिक रोटियां सेकते हैं.

3. पुलिस ज्यादतियों की निष्पक्ष जांच, जवाबदेही दोनों पक्षों की

अदालत ने जहां एक तरफ उपद्रवियों को कटघरे में खड़ा किया, वहीं दूसरी तरफ पुलिस बल द्वारा की गई ज्यादतियों, लाठीचार्ज और गंभीर चोटों के आरोपों पर भी कड़ा संज्ञान लिया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नीट परीक्षा विरोध या अन्य प्रदर्शनों के दौरान महिलाओं, वकीलों या मीडियाकर्मियों पर अनुचित बल प्रयोग हुआ है, तो इसकी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होना अनिवार्य है. कानून का राज केवल प्रदर्शनकारियों पर ही लागू नहीं होता, बल्कि व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों को भी तय सीमाओं और नियमों के भीतर रहकर काम करना होगा.

4. राष्ट्रव्यापी प्रोटोकॉल की आवश्यकता, पारंपारिक तरीकों से आगे बढ़ने का समय

सीजेआई सूर्य कांत ने जोर देकर कहा कि आज भीड़ और विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के पारंपरिक तरीके बदल चुके हैं. इसलिए पूरे देश के लिए एक स्पष्ट और आधुनिक अखिल भारतीय प्रोटोकॉल (All-India Protocol) तैयार करने की आवश्यकता है. जब पुलिस की प्रतिक्रिया और प्रदर्शनकारियों के आचरण के लिए एक तय सीमा रेखा होगी, तो उल्लंघन करने वाले किसी भी पक्ष को कानून के दायरे में लाना आसान होगा.

लोकतंत्र में असहमति और विरोध प्रदर्शन की जगह हमेशा बनी रहेगी, लेकिन यह व्यवस्था और संविधान की मर्यादा के भीतर ही संभव है. सुप्रीम कोर्ट का यह रुख संदेश देता है कि न्यायपालिका अधिकारों की रक्षा के लिए जितनी संवेदनशील है, कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाली हिंसक मानसिकता को कुचलने के लिए उतनी ही सख्त है.

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