- पांच दशकों तक सिद्धांतों से समझौता नहीं कर अंतरात्मा की आवाज पर टिके रहने वाले नेता का दर्द छलका
- वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धरमैया का 2028 का विधानसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा मौजूदा चुनावी राजनीति पर करारा प्रहार
बेंगलुरु. राजनीति जब सेवा का माध्यम न रहकर लेन-देन और पैसों का खेल बन जाए, तो दशकों तक उस व्यवस्था को करीब से देखने वाले राजनेता का मोहभंग होना स्वाभाविक है. कर्नाटक की राजनीति में करीब पांच दशकों तक गहरी छाप छोड़ने वाले पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता सिद्धरमैया ने जब 2028 का विधानसभा चुनाव न लड़ने की घोषणा की, तो यह सिर्फ एक चुनावी संन्यास नहीं, बल्कि मौजूदा दौर की चुनावी राजनीति पर एक करारा प्रहार भी है.
“राजनीति अब पूरी तरह भ्रष्ट हो चुकी है”
सिद्धरमैया की इस घोषणा के पीछे की सबसे बड़ी वजह वह तल्ख सच्चाई है, जिसे उन्होंने बिना किसी झिझक के स्वीकार किया. अपने सोशल मीडिया संदेश के जरिए 79 वर्षीय नेता ने चुनावी राजनीति के लगातार गिरते स्तर पर गहरा दुख और निराशा जताई. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि आज के दौर में अगर चुनाव लड़ना है, तो लोगों को पैसे देने पड़ते हैं. राजनीति का मूल चरित्र और ईमानदारी अब दम तोड़ चुकी है.
1978 में एक तालुक बोर्ड सदस्य के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने वाले सिद्धरमैया के लिए यह बदलाव बेहद पीड़ादायक है. पांच दशकों के लंबे राजनीतिक सफर में उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे, जीत और हार का स्वाद चखा, लेकिन जिस तरह से राजनीति में पैसे का बोलबाला बढ़ा है, उसने उन्हें चुनावी राजनीति से अलग होने पर मजबूर कर दिया.
बढ़ती उम्र और शरीर की सीमाएं
चुनावी मैदान को छोड़ने के पीछे केवल राजनीतिक निराशा ही एकमात्र कारण नहीं है, बल्कि समय और उम्र का तकाजा भी एक बड़ी वजह है. सिद्धरमैया ने अपनी सेहत और घटते उत्साह को लेकर भी सोशल मीडिया पर खुलकर बात की. उन्होंने बताया कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल खत्म होने तक वह 81-82 वर्ष के हो जाएंगे.
शरीर अब पहले जैसी मेहनत और ऊर्जा का साथ नहीं दे पाता. जिस जोश के साथ वे पहले जनता के बीच जाकर काम करते थे, ढलती उम्र में उस रफ्तार को बनाए रखना संभव नहीं रह गया है. अपने निर्वाचन क्षेत्र वरुणा के समर्थकों और जनता के दबाव के बावजूद उन्होंने अपनी सीमाओं को समझा और भविष्य में कोई भी चुनाव न लड़ने का मन बना लिया.
संन्यास चुनावी राजनीति से, जनसेवा से नहीं
सिद्धरमैया का यह फैसला चुनावी मैदान से हटने का जरूर है, लेकिन सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूर होने का नहीं. उन्होंने साफ किया कि भले ही वे अब वोट की राजनीति का हिस्सा न बनें, लेकिन जनता के दुख-दर्द और मुद्दों के खिलाफ उनकी आवाज उठती रहेगी.
पांच दशकों तक अपने सिद्धांतों से समझौता न करने और अपनी अंतरात्मा की आवाज पर टिके रहने का संतोष जताते हुए उन्होंने कर्नाटक की जनता का आभार जताया. उनका मानना है कि जिस जनता ने उन्हें आधी सदी तक प्यार और सम्मान दिया, उसका कर्ज वे जीवन की आखिरी सांस तक जनसेवा के जरिए चुकाते रहेंगे. सिद्धरमैया का यह फैसला भारतीय राजनीति के उस दौर की ओर इशारा करता है, जहां आदर्श और सादगी धीरे-धीरे पीछे छूट रहे हैं और धनबल-बाहुबल का दबदबा बढ़ता जा रहा है.
सोशल मीडिया से



