नई दिल्ली. सार्वजनिक स्थलों, विशेषकर मेट्रो, बस और पार्कों में मोबाइल स्क्रीन पर परोसी जा रही अश्लीलता क्या अब बीते दिनों की बात हो जाएगी? सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सामाजिक बुराई पर चिंता तो जताई है, लेकिन इस पर कानूनी डंडा चलाने के बजाय नीतिगत बदलाव की जरूरत को रेखांकित किया है.
शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि यह मुद्दा जितना संवेदनशील है, इसका समाधान उतना ही तकनीकी है, इसलिए अब इस पर अंतिम फैसला सरकार को ही लेना होगा.
‘डिजिटल लत’ और सुरक्षा पर मंडराता खतरा
आज के इस दौर में शायद ही कोई ऐसा सार्वजनिक वाहन या स्थान हो, जहां लोग स्मार्टफोन में न डूबे हों. डिजिटल क्रांति का एक स्याह पहलू यह है कि सार्वजनिक जगहों पर अश्लील सामग्री (पोर्नोग्राफी) का उपभोग तेजी से बढ़ा है. सामाजिक कार्यकर्ता बीएल जैन द्वारा दायर जनहित याचिका में इसके बेहद खौफनाक आंकड़े पेश किए गए.
याचिका के अनुसार, इंटरनेट पर हर सेकंड 5,000 से अधिक पोर्न साइट्स देखी जा रही हैं और करोड़ों की संख्या में क्लिप्स उपलब्ध हैं. सार्वजनिक स्थानों पर इस तरह के कंटेंट का खुला प्रदर्शन न केवल सामाजिक शालीनता और नैतिकता को तार-तार करता है, बल्कि सफर कर रही महिलाओं की सुरक्षा और बच्चों के कोमल मानस पर बेहद घातक असर डालता है. याचिका में यह भी दलील दी गई कि इस लत के कारण समाज में यौन अपराधों का ग्राफ भी बढ़ रहा है.
कोर्ट का निर्णय: ‘मुद्दा गंभीर, पर समाधान न्यायपालिका के पास नहीं’
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने माना कि याचिकाकर्ता ने जिस विषय को उठाया है, वह बेहद महत्वपूर्ण और विचारणीय है. इसके बावजूद, कोर्ट ने इस जनहित याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह पूरी तरह से एक नीतिगत (Policy) मामला है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि इसमें कानून की व्याख्या से जुड़ा ऐसा कोई सीधा सवाल नहीं है जिस पर कोर्ट कोई निर्देश जारी करे. सार्वजनिक स्थानों पर इंटरनेट एक्सेस को फिल्टर करना या ऐसी सामग्री पर रोक लगाना एक जटिल तकनीकी प्रक्रिया है. इसके लिए विशेषज्ञों की राय और विस्तृत कार्ययोजना की आवश्यकता होती है, जो कि न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का हिस्सा नहीं है.
सरकार के कदम : धारा 69A और आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने अब पूरी जिम्मेदारी सरकार के कंधों पर डाल दी है. पीठ ने याचिकाकर्ता को सलाह दी है कि वह अपनी चिंताओं और तकनीकी सुझावों को सीधे इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के समक्ष प्रस्तुत करें.
याचिका में खुद इस बात का उल्लेख है कि सरकार के पास सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत असीमित शक्तियां हैं. इसके तहत सरकार किसी भी ऐसे डिजिटल स्रोत या जानकारी तक जनता की पहुंच को बाधित (Block) करने का निर्देश दे सकती है, जो समाज के लिए खतरा हो.
अब यह पूरी तरह सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वह तकनीकी विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक ऐसी राष्ट्रीय नीति और फुलप्रूफ कार्ययोजना तैयार करे, जिससे व्यक्तिगत गोपनीयता का हनन किए बिना सार्वजनिक स्थानों और विशेषकर नाबालिगों को इस ‘डिजिटल प्रदूषण’ से सुरक्षित रखा जा सके.




