पलामू. झारखंड के पलामू जिले में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की वास्तविक तस्वीर एक बार फिर कटघरे में खड़ी हो गई है. हाल ही में द फोटोन न्यूज़ पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, मेदिनीनगर सदर अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) संजय पांडेय द्वारा पाटन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) का औचक निरीक्षण किया गया, जिसमें सरकारी अस्पतालों की लचर कार्यप्रणाली और मनमानी की पोल खोलकर रख दी है.
निरीक्षण के दौरान प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी समेत कुल 14 डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मी अपनी ड्यूटी से गायब मिले, जिससे यह सवाल लाजिमी है कि भगवान भरोसे चल रहे इन चिकित्सा केंद्रों में आम गरीबों को भला समय पर इलाज कैसे मिल पाएगा.
हाजिरी में दर्ज है उपस्थिति, ड्यूटी से गायब
एसडीओ की इस अचानक जांच से अस्पताल परिसर में हड़कंप मच गया. पड़ताल में सामने आया कि गृह रक्षक पूनम कुमारी भी ड्यूटी पर मौजूद नहीं थीं, जबकि उनकी अगले दिन तक की अग्रिम हाजिरी पहले ही रजिस्टर में दर्ज कर दी गई थी. इस तरह की धांधली यह दर्शाती है कि कागजों पर सब कुछ दुरुस्त दिखाने के लिए किस हद तक मनमानी की जा रही है.
एक अन्य मामले में डॉ. रामाश्रय ने उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर तो कर रखे थे, लेकिन वे मौके से गायब पाए गए. उनके बारे में यह जानकारी भी सामने आई कि वे अपने निजी क्लीनिक का संचालन कर रहे हैं, जिससे साफ होता है कि सरकारी सेवा की आड़ में निजी प्रैक्टिस का खेल धड़ल्ले से चल रहा है.
व्यवस्थाओं की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अस्पताल में न तो कोई ड्यूटी रोस्टर उपलब्ध था और न ही वैक्सीन स्टॉक पंजी को अद्यतन किया गया था. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी की मेज पर एक निजी पैथोलॉजी लैब का कार्ड बरामद हुआ, जो सरकारी तंत्र और निजी मेडिकल माफियाओं के बीच की सांठगांठ की ओर स्पष्ट इशारा करता है.
अस्पताल की ओपीडी और ड्रेसिंग रूम में गंदगी का अंबार लगा हुआ था और बायो-मेडिकल वेस्ट के वैज्ञानिक एवं उचित प्रबंधन का कोई नामोनि निशान तक नहीं था. हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी स्वास्थ्य इकाई में निरीक्षण के समय एक भी मरीज भर्ती नहीं पाया गया, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि जनता इन लचर व्यवस्थाओं से तौबा कर चुकी है.
यह कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों के स्वास्थ्य केंद्रों में निरीक्षण के दौरान इस तरह की अनियमितताएं आम बात बन चुकी हैं. समय-समय पर प्रशासनिक अधिकारियों के छापे पड़ते हैं, कमियां उजागर होती हैं और कागजी कार्रवाई की चेतावनी दी जाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई सुधार देखने को नहीं मिलता.
बहरहाल, पाटन सीएचसी की इस व्यवस्था को देख एसडीओ ने गंभीर नाराजगी जताई है और विभागीय अधिकारियों को इस बाबत लिखकर कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए हैं. अब देखना यह होगा कि इस औचक निरीक्षण के बाद सुस्त पड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था की नींद टूटती है या फिर फाइलों में दबकर यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाता है.




