नई दिल्ली/रांची. झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं और गड़बड़ियों का मामला अब देश की शीर्ष अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी, मूल्यांकन में धांधली और मेरिट लिस्ट में विसंगतियों का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है. इस याचिका के जरिए अभ्यर्थियों ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित परीक्षा को रद्द करने या पूरे मामले की निष्पक्ष केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की गुहार लगाई है.
क्या है पूरा मामला?
JPSC द्वारा आयोजित सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम जारी होने के बाद से ही विवाद गहराता जा रहा है. अभ्यर्थियों का आरोप है कि आयोग ने श्रेणीवार (Category-wise) कट-ऑफ अंक जारी किए बिना ही परिणाम घोषित कर दिए. इसके अलावा सोशल मीडिया पर कई अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट वायरल हुई थीं, जिनमें कम प्रश्न हल करने के बावजूद अभ्यर्थियों को सफल घोषित किए जाने के गंभीर आरोप लगे थे.
राज्य भर में छात्रों के कड़े विरोध और प्रदर्शनों के बाद झारखंड सरकार ने मामले की सीआईडी (CID) जांच के आदेश दिए थे. सीआईडी जांच के दौरान जेपीएससी के एक वरिष्ठ अधिकारी और परीक्षा आयोजित कराने वाली निजी एजेंसी के निदेशक सहित कई लोगों को गिरफ्तार भी किया जा चुका है. विवाद बढ़ता देख आयोग ने प्रस्तावित मुख्य परीक्षा (Mains Exam) को स्थगित कर दिया था.
याचिकर्ताओं की मांग
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि सीआईडी जांच के बावजूद निष्पक्षता पर सवाल बरकरार हैं, क्योंकि आयोग और निजी एजेंसियों की भूमिका संदिग्ध रही है. अभ्यर्थियों का मानना है कि इस गड़बड़ी से हजारों मेधावी और कठिन परिश्रम करने वाले छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है.
इसलिए: निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए मामले की जांच CBI जैसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए. यदि अनियमितता बड़े पैमाने पर साबित होती है, तो परीक्षा को पूरी तरह रद्द कर नए सिरे से पारदर्शी ढंग से आयोजित कराया जाए. झारखंड में JPSC की परीक्षाओं को लेकर लंबे समय से विवाद होते रहे हैं. अब अभ्यर्थियों और राज्य के लोगों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की संभावित सुनवाई और रुख पर टिकी हुई हैं.


