रांची. झारखंड के प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक खास मामले को लेकर दबी जुबान से खूब चर्चा हो रही है। चर्चा का केंद्र हैं ग्रामीण विकास विशेष अंचल, रांची में अतिरिक्त प्रभार पर तैनात अधीक्षण अभियंता एवं चाईबासा के तत्कालीन कार्यपालक अभियंता जितेंद्र पासवान (ID-4421)। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की चार्जशीट के बावजूद उन्हें जिस तरह से मलाईदार प्रभार और प्रोन्नति से नवाजा गया है, उसने व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
झारखंड आंदोलनकारी सुनील सिरका ने इस पूरे मामले को लेकर मुख्य सचिव को शिकायत पत्र भेजा है और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। साथ ही, सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत दस्तावेज जुटाने की पहल भी शुरू कर दी गई है।
क्या है पूरा मामला और कैसे हुई सरकार की चूक?
शिकायत के अनुसार, जितेंद्र पासवान के खिलाफ एसीबी, रांची में थाना कांड संख्या 58/16 दर्ज है। लंबी जांच के बाद न्यायालय में अंतिम प्रतिवेदन संख्या 02/20 (दिनांक 16 जनवरी 2020) के तहत चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। इसके अलावा, लोहरदगा सदर अस्पताल के 100 बेड वाले वार्ड भवन के निर्माण कार्य में कथित वित्तीय अनियमितता के मामले में भी 4 जून 2019 को निगरानी प्रभाग की रिपोर्ट के आधार पर मामला एसीबी को भेजा गया था।
प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि जब एक अभियंता के खिलाफ न्यायालय में चार्जशीट दाखिल हो चुकी थी और गंभीर मामले लंबित थे, तब प्रशासनिक स्तर पर इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई?
विजिलेंस क्लीयरेंस और प्रोन्नति पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाला पहलू वह ‘स्वच्छता प्रमाणपत्र’ यानी विजिलेंस क्लीयरेंस है, जो तमाम गंभीर मामलों के बावजूद 29 जुलाई 2024 को जारी किया गया। इसी कथित क्लीयरेंस के आधार पर फरवरी 2025 में उन्हें अधीक्षण अभियंता के पद पर प्रोन्नति दे दी गई और बाद में मुख्य अभियंता तथा न्यायिक-विधिक कार्यों जैसे महत्वपूर्ण प्रभार भी सौंप दिए गए।
अब प्रशासनिक हल्के में यह चर्चा जोरों पर है कि—
- क्या विजिलेंस क्लीयरेंस देने से पहले एसीबी कांड और चार्जशीट के तथ्यों की अनदेखी की गई?
- क्या क्लीयरेंस जारी करने वाले अधिकारियों के संज्ञान में ये बातें लाई गई थीं या फिर यहां प्रणाली स्तर पर भारी चूक हुई?
शिकायतकर्ता सुनील सिरका ने मुख्य सचिव से मांग की है कि एसीबी मामले, वित्तीय अनियमितताओं और विजिलेंस क्लीयरेंस जारी करने की पूरी प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच हो, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय की जाए और इस प्रोन्नति व प्रभार की नियमसम्मत समीक्षा की जाए।
फिलहाल, प्रशासनिक गलियारों में इस “विशेष मेहरबानी” और सरकारी तंत्र की इस बड़ी चूक को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है और अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है।


