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Home » हर विवाद एससी-एसटी एक्ट का दायरा नहीं… इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जानिए क्या कहा अदालत ने…
देश/दुनिया

हर विवाद एससी-एसटी एक्ट का दायरा नहीं… इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, जानिए क्या कहा अदालत ने…

Ocean News DeskBy Ocean News DeskOctober 26, 2026
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इलाहाबाद. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC-ST) अत्याचार निवारण अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के उद्देश्य से एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सुनाया है। एबीपी लाइव की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने साफ किया है कि केवल शिकायतकर्ता के अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय से होने मात्र से हर जातिगत विवाद पर एससी-एसटी एक्ट लागू नहीं हो जाता।

मामले की पृष्ठभूमि और एफआईआर

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के इटवा थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा हुआ है। अमरनाथ चौधरी नामक व्यक्ति के खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र की शिकायत किए जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच मारपीट हुई। इस मामले में पुलिस ने मारपीट के साथ-साथ एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट के तहत भी गंभीर धाराओं में कार्रवाई की थी। इसके बाद, विशेष न्यायाधीश की अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लेकर समन जारी करने के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई थी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने की। अदालत ने कानूनी पहलुओं और तथ्यों की गहराई से समीक्षा करते हुए कहा कि किसी भी आपराधिक मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध तब तक नहीं बनता, जब तक कि एफआईआर या शिकायत में यह स्पष्ट रूप से न बताया गया हो कि आरोपी ने विशेष रूप से पीड़ित को उसकी जाति के आधार पर अपमानित किया है या जानबूझकर सार्वजनिक रूप से जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल दो पक्षों के बीच किसी अन्य विवाद या आपसी रंजिश के दौरान यदि कोई झड़प होती है, और उसमें केवल यह तथ्य जोड़ दिया जाए कि पीड़ित एक विशेष जाति से है, तो इसे इस अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जा सकता। इसके लिए कानून में तय की गई शर्तों और आरोपों का पुख्ता होना अनिवार्य है।

किसको क्या राहत मिली?

इस महत्वपूर्ण फैसले के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता अमरनाथ चौधरी को एससी-एसटी एक्ट के आरोपों से पूरी तरह राहत दे दी है। अदालत को एफआईआर में जातिसूचक अपमान से जुड़े आरोप स्पष्ट नहीं मिले, जिसके चलते इस विशेष अधिनियम के तहत की गई कार्रवाई को खारिज कर दिया गया।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि एससी-एसटी एक्ट हटने का यह कतई मतलब नहीं है कि पूरा आपराधिक मुकदमा खत्म हो गया है। चूंकि मामले में मारपीट और अन्य संज्ञेय आरोप शामिल हैं, इसलिए मारपीट से जुड़े मामलों में कानूनी कार्रवाई और निचली अदालत की प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रहेगी।

निष्कर्ष और दूरगामी प्रभाव

कानूनी जानकारों का मानना है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन मामलों में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा, जहां आपसी विवादों या व्यक्तिगत दुश्मनी को दबाने के लिए एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों का दुरुपयोग करने की कोशिश की जाती है। अदालत के इस निर्णय से कानून का दायरा और अधिक स्पष्ट हुआ है, जिससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि इस विशेष कानून का वास्तविक उद्देश्य यानी पीड़ितों को न्याय दिलाना बना रहे, साथ ही निर्दोषों का उत्पीड़न भी रुके।

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