- समाचार4मीडिया के मंच ‘पत्रकारिता 40 अंडर 40’ से दिग्गज मीडिया हस्तियों ने इंडस्ट्री के अतीत, वर्तमान और भविष्य पर उठाये विचारोत्तेजक सवाल
भारतीय मीडिया जगत में वर्तमान समय बदलाव के एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक दौर से गुजर रहा है. तकनीक और सोशल मीडिया के इस आक्रामक प्रसार ने पारंपरिक माध्यमों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. इसी परिदृश्य पर मंथन करने के लिए आयोजित समाचार4मीडिया के प्रतिष्ठित मंच ‘पत्रकारिता 40 अंडर 40’ में दिग्गज मीडिया हस्तियों ने इंडस्ट्री के अतीत, वर्तमान और भविष्य को लेकर तीखे और विचारोत्तेजक सवाल उठाए.
अतीत की प्रतिष्ठा और वर्तमान का संकट
कार्यक्रम के दौरान इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी (INS) के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार राकेश शर्मा ने अपने पांच दशकों के लंबे करियर के अनुभव साझा किए. उन्होंने याद किया कि एक दौर था जब प्रिंट मीडिया लोकतंत्र का सशक्त प्रहरी होने के साथ-साथ एक महान मिशन हुआ करता था. उस समय जिला स्तर के ब्यूरो चीफ और संपादकों का प्रभाव कलेक्टर, एसपी से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक से कहीं अधिक आंका जाता था. पत्रकार समाज के वास्तविक ‘इन्फ्लुएंसर’ हुआ करते थे.
किंतु, आज स्थिति बिल्कुल उलट चुकी है. सूचना क्रांति के कारण अब पल-पल की खबरें और दुनिया भर के अपडेट सीधे लोगों के मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध हैं. आधुनिक जीवनशैली, भागदौड़ और महानगरों के लंबे सफर के बीच आम आदमी की प्राथमिकता से प्रिंट अखबार अब धीरे-धीरे बाहर होते जा रहे हैं.
महंगे संसाधनों और घटते प्रसार की दोहरी मार
कार्यक्रम में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई कि एक तरफ जहां न्यूज़प्रिंट, स्याही और प्लेट जैसी प्रिंटिंग सामग्री की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं, वहीं दूसरी तरफ अखबारों का दायरा और प्रसार संख्या घट रही है. उद्योग जगत में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि इस वित्तीय घाटे की भरपाई कैसे की जाए.
हालांकि, इस बीच सबसे बड़ा और चुभने वाला सवाल यह उठाया गया कि क्या समस्या सिर्फ बढ़ती हुई कीमतों की है? वक्ताओं ने दो टूक शब्दों में कहा कि असल संकट लागत का नहीं, बल्कि पाठकों के मोहभंग होने का है. जब हर छोटी-बड़ी खबर एक क्लिक पर फोन पर मिल रही है, तो कोई पाठक केवल सामान्य सूचना के लिए अखबार पर पैसे क्यों खर्च करेगा? यह वह आत्ममंथन वाला प्रश्न है जिससे आज के हर मीडिया संस्थान को दो-चार होना पड़ रहा है.
भविष्य की पत्रकारिता: ‘एक्सप्लेनेटरी जर्नलिज्म’ की अनिवार्यता
विश्लेषण में यह बात प्रमुखता से उभरी कि अब केवल सतही खबरें छापने का समय लद चुका है. भविष्य की पत्रकारिता का स्वरूप ‘एक्सप्लेनेटरी’ यानी व्याख्यात्मक होना अनिवार्य है. पाठक अब केवल घटना की पुष्टि नहीं चाहता, बल्कि वह उसके पीछे की छिपी हुई कहानी, उसके कारणों और उसके दूरगामी प्रभावों को गहराई से समझना चाहता है.
अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया कि मीडिया का माध्यम भले ही प्रिंट से डिजिटल या किसी अन्य रूप में क्यों न बदल जाए, लेकिन उसका मूल आधार कभी नहीं हिलना चाहिए. विज्ञापन और सफलता अंततः वहीं टिकती है जहां जागरूक पाठक या दर्शक मौजूद होते हैं. यदि मीडिया घरानों ने अपने हर फैसले के केंद्र में जनता की वास्तविक जरूरतों और अपेक्षाओं को नहीं रखा, तो उनके अस्तित्व पर मंडरा रहा संकट और गहराता जाएगा.


