- चक्रधरपुर रेलमंडल के ऑपरेटिंग कंट्रोल कार्यालय में डक्ट एसी इंस्टॉलेशन में बड़ी अनियमितता की सूचना, सरकारी राशि के दुरुपयोग की आशंका
चक्रधरपुर. भारतीय रेलवे में नीति-निर्देश और सुरक्षा मानक कागज़ों तक ही सीमित रह गए हैं, जबकि धरातल पर ठेकेदारों और अधिकारियों का ‘मजबूत गठजोड़’ निर्बाध रूप से फल-फूल रहा है. इसका ताजा उदाहरण चक्रधरपुर रेलमंडल के सबसे संवेदनशील केंद्र ‘ऑपरेटिंग कंट्रोल कार्यालय’ में देखने को मिला है, जहां लाखों रुपये की लागत से हो रहे डक्ट एसी (Duct AC) इंस्टॉलेशन में खुलेआम धांधली बरती जा रही है.
टेंडर की स्पष्ट शर्तों को दरकिनार कर उपकरण जिस कच्चे लोहे के ढांचे पर टिकाए गए हैं, उस पर अभी से जंग लगना शुरू हो चुका है. यह लापरवाही न केवल सरकारी राजस्व को पानी में बहा रही है, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाले कंट्रोल रूम की संरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है.
कबाड़ पर टिकी सुरक्षा, जंग खा रहा ढांचा, हादसों को न्यौता
टेंडर संख्या IF255970 और IF255971C के तहत ऑपरेटिंग कंट्रोल को वातानुकूलित करने के लिए 24 एसी यूनिट्स का काम चल रहा है. नियमों के मुताबिक, सभी सपोर्टिंग स्ट्रक्चर पूरी तरह गैल्वेनाइज्ड (Galvanized Steel) होने चाहिए ताकि नमी के बावजूद इनमें जंग न लगे.
हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि ठेकेदार ने घटिया स्तर के सामान्य लोहे का इस्तेमाल कर उपकरणों को टांग दिया है. समय से पहले जंग पकड़ रहे ये ढांचे कभी भी भारी-भरकम उपकरणों का भार सहने में नाकाम होकर किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकते हैं.

इंसुलेशन गायब, गुणवत्ता के नाम पर खानापूरी
धांधली सिर्फ बाहरी ढांचे तक सीमित नहीं है. सूत्रों का कहना है कि एसी स्टॉलेशन में गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया, न ही उसकी निगरानी की जा रही है. यहां जांच से कई तथ्य सामने आ सकते हैं.
- साउंड और थर्मल इंसुलेशन में चोरी: कंट्रोल रूम में शांति और सही तापमान बनाए रखने के लिए Acoustic और Thermal Insulation अनिवार्य था, जिसे या तो पूरी तरह छोड़ दिया गया या बेहद पतली सामग्री से निपटा दिया गया.
- पानी टपकने और शॉर्ट-सर्किट का जोखिम: सही इंसुलेशन न होने से भविष्य में कंडेनसेशन (पानी जमना व टपकना) की समस्या होगी, जिससे नीचे लगे संवेदनशील रेलवे उपकरणों में शॉर्ट-सर्किट का खतरा पैदा हो सकता है.
- शीट की मोटाई से समझौता: 22 और 24 SWG की मानक मेटल शीट की जगह हल्के दर्जे के सामान का इस्तेमाल किया गया है.
करोड़ों डुबोने के बाद भी नहीं जगी चेतना
इलेक्ट्रिकल विभाग (General) की कार्यशैली पर यह पहला दाग नहीं है. लगभग पांच साल पूर्व इसी विभाग ने रेलकर्मियों की सुविधा के नाम पर “डक्ट एयर कूलर” योजना में करोड़ों रुपये स्वाहा किए थे. वह सिस्टम एक दिन भी सुचारू रूप से नहीं चल सका.
अब उसी इतिहास को दोहराते हुए डक्ट एसी के नाम पर फिर से जनधन की बर्बादी की जा रही है. पुरानी असफलताओं से सबक लेने के बजाय जिम्मेदार तंत्र लगातार आंखें मूंदे बैठा है.
निगरानी प्रणाली पंगु: थर्ड पार्टी जांच पर मौन
इस पूरे प्रकरण में रेलवे की निगरानी प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त नजर आती है:
- थर्ड पार्टी इंस्पेक्शन कहां है? टेंडर की शर्तों में स्वतंत्र एजेंसी से गुणवत्ता जांच (Third Party Inspection) का प्रावधान था. सवाल यह उठता है कि क्या यह जांच कागजों पर हुई या अधिकारियों ने बिना देखे ही हरी झंडी दे दी?
- जिम्मेदारी तय करने से गुरेज: सरकारी खजाने की इस लूट पर न तो ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने की हिम्मत दिखाई जा रही है और न ही साइट इंजीनियरों से जवाब-तलब हो रहा है.
उच्चस्तरीय जांच की मांग
ऑपरेटिंग कंट्रोल जैसे अति-संवेदनशील विभाग में इस तरह का समझौता रेल संचालन की सुरक्षा से खिलवाड़ है. रेलकर्मियों और स्थानीय यूनियनों ने मांग की है कि मंडल रेल प्रबंधक (DRM) तत्काल इस मामले में हस्तक्षेप करें. इस्तेमाल की गई सामग्रियों का लैब टेस्ट कराया जाए और दोषी इंजीनियरों व ठेकेदार के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए.
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