जमशेदपुर/चाईबासा. झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम जिला इन दिनों गंभीर स्वास्थ्य संकट के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है. माओवादी प्रभावित चाईबासा क्षेत्र में तैनात सुरक्षा बलों के बीच मलेरिया एक विकराल रूप लेता जा रहा है. हाल ही में सीआरपीएफ की 197वीं बटालियन में तैनात एक युवा जवान की मलेरिया संक्रमण के कारण हुई दर्दनाक मौत ने पूरे महकमे को झकझोर कर रख दिया है. इस घटना के बाद से यह इलाका मानों ‘मलेरिया जोन’ के रूप में तब्दील होता दिख रहा है, जहां सुरक्षाकर्मी भी सुरक्षित नहीं हैं.
क्या है पूरा मामला?
मिली जानकारी के अनुसार, चाईबासा में तैनात CRPF के 197वीं बटालियन के जवान पिंटू कुमार साव (35) की ड्यूटी के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ गई थी. 28 जुलाई को जब उनकी चिकित्सकीय जांच कराई गई, तो रिपोर्ट में गंभीर मलेरिया संक्रमण की पुष्टि हुई. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्हें तुरंत बेहतर इलाज के लिए जमशेदपुर के एमजीएम अस्पताल रेफर कर दिया गया.
अस्पताल के चिकित्सकों ने उन्हें बचाने के लिए हरसंभव प्रयास किए, लेकिन संक्रमण इतना बढ़ चुका था कि बुधवार तड़के करीब चार बजे उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया. जवान के असामयिक निधन की खबर मिलते ही सहयोगियों में शोक की लहर दौड़ गई है.
सैन्य सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई
निधन के पश्चात एमजीएम अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस में पार्थिव शरीर को लाया गया, जहां CRPF के वरिष्ठ अधिकारियों और जवानों ने पूरे सैन्य सम्मान के साथ दिवंगत जवान को अंतिम सलामी दी और भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव बिहार के वैशाली जिले के फरीदपुर भेजने की व्यवस्था की गई, जहां उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा.
दिवंगत जवान पिंटू कुमार साव के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा पांच वर्ष और तीन वर्ष की दो मासूम बेटियां और दो माह का एक बेटा है. इस अचानक हुए हादसे से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है.
स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर उठ रहे गंभीर सवाल
चाईबासा और आसपास के जंगली व नक्सल प्रभावित इलाकों में फैल रहा मलेरिया कोई नई समस्या नहीं है, लेकिन इस बार इसने एक फ्रंटलाइन सुरक्षाकर्मी की जान ले ली है, जिससे स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं. स्थानीय लोगों और विभिन्न संगठनों का कहना है कि यदि समय पर एंटी-लारवा छिड़काव, फॉगिंग और शिविर लगाकर स्वास्थ्य परीक्षण जैसी पुख्ता व्यवस्थाएं की जातीं, तो जवान की जान बचाई जा सकती थी.
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के इस सीजन में ग्रामीण और अंदरूनी जंगली इलाकों में मच्छरों का प्रकोप अत्यधिक बढ़ जाता है, जिससे मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां महामारी का रूप ले लेती हैं. यदि प्रशासन ने जल्द ही चाईबासा के इन संवेदनशील क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य शिविर और फॉगिंग अभियान नहीं चलाया, तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है.
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