प्रबंध संपादक की कलम से
एक वैचारिक टिप्पणी को विपक्ष ने अपनी नासमझी के चलते अपने ही खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक ट्रैप बना लिया. जहां विपक्षी दल मोदी विरोध की आंधी में खुद को नक्सली विचारधारा से जोड़ने में गौरव महसूस कर रहे हैं, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे जनता के बीच एक बड़ा नैरेटिव बनाने में सफलता हासिल कर ली है कि देश का विरोध करने वाले आज वैचारिक रूप से बेनकाब हो चुके हैं.
भारतीय राजनीति इन दिनों एक नए और तीखे वैचारिक संघर्ष के केंद्र में है. लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए एक बयान ने राजनीतिक गलियारों में ऐसा भूचाल ला दिया है, जिसने सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के तेवर बदल दिए हैं. पीएम मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर शुरू हुआ घमासान अब केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह 2029 के राजनीतिक समीकरणों को साधने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा बन चुका है.
प्रधानमंत्री मोदी का मास्टरस्ट्रोक और ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा
स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि देश से पारंपरिक हथियारबंद नक्सलवाद तो लगभग समाप्त हो चुका है, लेकिन अब एक नए खतरे से सतर्क रहने की आवश्यकता है ‘दिमागी नक्सल’ (Brainstorming/Intellectual Naxalism).
पीएम का इशारा
- अराजकता और अशांति को बढ़ावा देना, समाज में वैमनस्य और वैचारिक अराजकता फैलाने वाले तत्व.
- कुशासन और विध्वंस का समर्थन, देश की मूल व्यवस्था और विकास की गति को ब्रेक लगाने वाली मानसिकता.
- राष्ट्र-विरोधी और राष्ट्र-विनाशक सोच जो लोग छुपे तौर पर देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता को वैचारिक स्तर पर कमजोर करने का प्रयास करते हैं.
विपक्ष का ‘आत्मघाती’ दांव, खुद को ‘दिमागी नक्सली’ घोषित करने की होड़
प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद राजनीतिक विश्लेषक हैरान हैं कि बिना किसी का नाम लिए दिए गए इस भाषण पर विपक्षी दलों ने खुद ही इस जूते को पहन लिया. मोदी विरोध की धार में बहते-बहते विपक्ष के दिग्गज नेताओं ने सार्वजनिक रूप से खुद को ‘दिमागी नक्सली’ करार देना शुरू कर दिया, जिसे सत्ता पक्ष ने उनके वैचारिक पतन के रूप में भुनाना शुरू कर दिया है:
पी. चिदंबरम (कांग्रेस): देश के पूर्व गृह मंत्री रह चुके वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने गर्व के साथ खुद को ‘दिमागी नक्सली’ बताया और कहा कि उन्हें इस पर प्राउड है. बीजेपी ने इस पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि जिस दौर में वे गृह मंत्री थे, देश का एक बड़ा हिस्सा नक्सलवाद की आग में सुलग रहा था.
महबूबा मुफ्ती (PDP): जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष ने सोशल मीडिया पर खुलकर लिखा कि वह आर्टिकल 370 का समर्थन करती हैं और वह एक ‘दिमागी नक्सल’ हैं.
अरविंद केजरीवाल (आप): दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक ने वीडियो जारी कर प्रधानमंत्री के बयान को चुनौती दी. उन्होंने कहा कि अच्छे स्कूल, अस्पताल, बिजली-पानी और भ्रष्टाचार मुक्त भारत चाहने वाला व्यक्ति यदि पीएम की नजर में ‘दिमागी नक्सली’ है, तो वह गर्व से खुद को ऐसा मानते हैं.
बीजेपी का आक्रामक पलटवार और वैचारिक पोस्टमार्टम
सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष के इस आत्म-स्वीकार को एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है. बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए विपक्ष पर सीधा निशाना साधा और कहा कि जो लोग आतंकवादियों और अलगाववादियों (जैसे हाफिज सईद, याकूब मेमन, ओसामा, जाकिर नायक या बुरहान वानी) में सहानुभूति तलाशते हैं, वे ही असल में इस वैचारिक विकृति का शिकार हैं.
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिश्व सरमा ने भी पी. चिदंबरम के बयान पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि ऐसे नेता सिर्फ ‘दिमागी नक्सल’ नहीं, बल्कि सीधे तौर पर व्यवस्था को भीतर से कमजोर करने वाली मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं.
राजनीतिक खेल के बीच बीजेपी की नई टीम और 2029 की तैयारी
एक तरफ जहां पूरा विपक्षी इकोसिस्टम ‘दिमागी नक्सल’ की इस वैचारिक बहस और अंतर्विरोध में उलझा हुआ है, वहीं पर्दे के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह वाली पार्टी नेतृत्व ने एक बड़ा प्रशासनिक और सांगठनिक कदम उठा लिया है.
हाल ही में घोषित हुई बीजेपी की नई टीम ने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है. पार्टी संगठन में कई चौंकाने वाले और कड़े फैसले लिए गए हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह केवल एक मामूली फेरबदल नहीं है, बल्कि वर्ष 2029 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया एक मजबूत राजनीतिक ढांचा है, जो वैचारिक और सांगठनिक दोनों मोर्चों पर विपक्ष को चित करने के लिए उतरा है.
कुल मिलाकर, यह राजनीतिक एपिसोड इस बात का गवाह है कि कैसे एक वैचारिक टिप्पणी को विपक्ष ने अपनी नासमझी के चलते अपने ही खिलाफ एक बड़ा राजनीतिक ट्रैप बना लिया. जहां विपक्षी दल मोदी विरोध की आंधी में खुद को नक्सली विचारधारा से जोड़ने में गौरव महसूस कर रहे हैं, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे जनता के बीच एक बड़ा नैरेटिव बनाने में सफलता हासिल कर ली है कि देश का विरोध करने वाले आज वैचारिक रूप से बेनकाब हो चुके हैं.
संजय कुमार, प्रबंध संपादक
इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक (प्रबंध संपादक) के निजी और विश्लेषणात्मक हैं. इससे संस्था या न्यूज पोर्टल के आधिकारिक रुख का पूरी तरह सहमत होना अनिवार्य नहीं है.


