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Home » 40 साल का समर्पण, एक वोट का दर्द, इंटरन से टाटा संस के शिखर तक चंद्रशेखरन के सफर की पूरी दास्तान
ओसियन स्पेशल

40 साल का समर्पण, एक वोट का दर्द, इंटरन से टाटा संस के शिखर तक चंद्रशेखरन के सफर की पूरी दास्तान

Ocean News DeskBy Ocean News DeskAugust 14, 2026
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“एक वोट की कमी और सर्वसम्मति न होने के कारण मैंने इस फैसले को टालना ही उचित समझा. टाटा संस एक विशाल संस्थान है और अनिश्चितता किसी भी सूरत में समूह हित में नहीं थी.”

भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास में बेहद कम ऐसी कहानियां हैं जो निष्ठा, निरंतरता और नेतृत्व की ऐसी मिसाल पेश करती हों, जैसा सफर एन. चंद्रशेखरन का रहा. वर्ष 1987 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में एक इंटर्न के रूप में अपना करियर शुरू करने वाले चंद्रशेखरन ने अगले 40 वर्षों तक टाटा समूह को अपनी सेवाएं दीं.

अपनी कड़ी मेहनत और दूरदर्शी नेतृत्व के बल पर वे टीसीएस के सीईओ बने और फिर 2017 में टाटा संस के पहले गैर-पारसी चेयरमैन के रूप में बागडोर संभाली.

चंद्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा समूह ने एयर इंडिया की वापसी, टाटा डिजिटल के माध्यम से सुपर ऐप लॉन्च करने और सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे कई साहसिक और ऐतिहासिक कदम उठाए. उनके नेतृत्व में समूह का बाजार पूंजीकरण और वार्षिक राजस्व $13.3$ लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया.

24 फरवरी की बोर्ड बैठक और इस्तीफा, कहां से शुरू हुआ दर्द?

40 साल की इस स्वर्णिम यात्रा का अंत उस समय एक बड़े मोड़ पर आकर रुका जब उन्होंने टाटा संस के चेयरमैन पद से इस्तीफा देने का फैसला किया. अपने सहयोगियों और निदेशकों को भेजे एक भावुक पत्र में चंद्रशेखरन का दर्द साफ छलका.

उन्होंने स्पष्ट किया कि सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) दोनों ने ही उनके 5 साल के कार्यकाल विस्तार का सर्वसम्मति से समर्थन किया था. बोर्ड की समिति ने भी इस प्रस्ताव की सिफारिश की थी.

हालांकि, 24 फरवरी को हुई बोर्ड बैठक में एक सदस्य के विरोध के कारण सर्वसम्मति नहीं बन सकी. चंद्रशेखरन ने बेहद भारी मन से कहा, “एक वोट की कमी और सर्वसम्मति न होने के कारण मैंने इस फैसले को टालना ही उचित समझा. टाटा संस एक विशाल संस्थान है और अनिश्चितता किसी भी सूरत में समूह हित में नहीं थी.” उन्होंने व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के बजाय संस्थान की मर्यादा और निरंतरता को प्राथमिकता दी.

विवाद व आईपीओ और टाटा ट्रस्ट्स के साथ मतभेद

विभिन्न मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, चंद्रशेखरन के इस्तीफे के पीछे कुछ नीतिगत मतभेद भी मुख्य कारण रहे:

  1. टाटा संस आईपीओ विवाद: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के नियमानुसार टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में सूचीबद्ध (IPO) किया जाना था. चंद्रशेखरन इस दिशा में कदम बढ़ा रहे थे, जबकि ट्रस्ट्स के कुछ सदस्यों को लग रहा था कि आईपीओ आने से समूह पर टाटा ट्रस्ट्स का नियंत्रण कम हो सकता है.

  2. टाटा ट्रस्ट्स से संबंध: साइरस मिस्त्री विवाद के बाद टाटा ग्रुप में शीर्ष नेतृत्व और ट्रस्ट्स के बीच तालमेल हमेशा संवेदनशील रहा है. बोर्ड में एक सदस्य का कड़ा रुख इस बात का संकेत था कि अंदरूनी तालमेल में दरार आ चुकी थी.

टाटा ट्रस्ट्स की प्रतिक्रिया और भविष्य की दिशा

इस्तीफे के बाद सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने आधिकारिक बयान जारी कर चंद्रशेखरन के योगदान की सराहना की और उनके फैसले का सम्मान किया. टाटा संस के नए चेयरमैन की खोज के लिए नियमों के अनुसार 5-सदस्यीय चयन समिति का गठन किया जा रहा है. 18 अगस्त को होने वाली एजीएम (AGM) से पहले यह प्रक्रिया शुरू होना समूह में स्थिरता बनाए रखने के लिए बेहद अहम माना जा रहा है.

एक साधारण इंटर्न से टाटा साम्राज्य के शिखर तक पहुंचने का चंद्रशेखरन का सफर प्रेरणादायक रहा, लेकिन इसका समापन कॉर्पोरेट गवर्नेंस और अंदरूनी असहमति की एक दर्दभरी मिसाल बनकर उभरा है.

कॉर्पोरेट जगत का बड़ा उलटफेर: एन चंद्रशेखरन के इस्तीफे से टाटा समूह में हलचल, AGM से पहले नेतृत्व पर गहराया संकट

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