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Home » दिशोम गुरु शिबू सोरेन को पद्म भूषण, आदिवासी अस्मिता और झारखंड आंदोलन को मिला राष्ट्रीय सम्मान
झारखंड

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को पद्म भूषण, आदिवासी अस्मिता और झारखंड आंदोलन को मिला राष्ट्रीय सम्मान

Ocean News DeskBy Ocean News DeskJune 24, 2026
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रांची.  झारखंड राज्य गठन आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में शामिल रहे दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मंगलवार को देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया. राष्ट्रपति भवन में आयोजित विशेष अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें मरणोपरांत यह सम्मान प्रदान किया. उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति के हाथों यह सम्मान ग्रहण किया. इस मौके पर झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की विधायक पत्नी कल्पना सोरेन भी मौजूद रहीं. केंद्र सरकार ने इस वर्ष गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर शिबू सोरेन के नाम का ऐलान किया था. आदिवासी समाज, गरीबों और वंचित तबकों के अधिकारों के लिए किए गए उनके लंबे संघर्ष और सामाजिक योगदान को देखते हुए उन्हें इस सम्मान से नवाजा गया है.

जल, जंगल और जमीन की लड़ाई से बने जननायक

11 जनवरी 1944 को वर्तमान रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन से ही आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार, जमींदारी शोषण और विस्थापन को करीब से देखा था. यही अनुभव आगे चलकर उनके संघर्ष की नींव बना. युवा अवस्था में ही उन्होंने आदिवासी अधिकार आंदोलन का रास्ता चुना. 1970 में शुरू हुए ‘धान काटो आंदोलन’ ने उन्हें पूरे क्षेत्र में पहचान दिलाई. इस आंदोलन के जरिए उन्होंने महाजनों और जमींदारों के खिलाफ मोर्चा खोला. जिन जमीनों पर गरीब और आदिवासियों का हक था, उसे वापस दिलाने के लिए उन्होंने लोगों को संगठित किया. 1980 के दशक में जब खनन परियोजनाओं, उद्योगों और वन कानूनों के नाम पर आदिवासियों की जमीन छीनी जा रही थी, तब शिबू सोरेन गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करते रहे. उन्होंने जल, जंगल और जमीन को आदिवासी अस्तित्व का आधार बताया.

शिबू सोरेन ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के जरिये अलग राज्य की मांग को मजबूत राजनीतिक आंदोलन का रूप दिया. उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक लगातार यह सवाल उठाया कि खनिज संपदा से समृद्ध क्षेत्र के मूल निवासी आखिर गरीब क्यों हैं. दशकों तक चले संघर्ष के बाद 15 नवंबर 2000 को झारखंड अलग राज्य बना. इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने में शिबू सोरेन की भूमिका सबसे अहम मानी जाती है. यही वजह है कि लोग उन्हें प्यार से ‘दिशोम गुरु’ और ‘गुरुजी’ कहकर पुकारते थे.

पांच बड़े काम जिन्होंने उन्हें जननायक बनाया

आदिवासी जमीन वापस दिलाने का अभियान : शिबू सोरेन ने आदिवासी सुधार समिति का गठन किया और महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष छेड़ा. उन्होंने उन जमीनों को मुक्त कराने की लड़ाई लड़ी जिन पर महाजनों ने कब्जा कर रखा था. बिरसा मुंडा के नारे ‘अबुआ दिशुम, अबुआ राज’ को जमीन पर उतारने की कोशिश की.

नशे के खिलाफ लगातार अभियान : गुरुजी शराब और नशे के सख्त खिलाफ थे. वे लोगों को समझाते थे कि नशे की वजह से उनकी जमीन और अधिकार छिन रहे हैं. परिवार तबाह होता है अलग. गांवों में जाकर वे लोगों को शराब और हड़िया से दूर रहने की सलाह देते थे.

सभी धर्मों को साथ लेकर चले : झारखंड आंदोलन के दौरान उन्होंने हमेशा कहा कि यह किसी एक धर्म का आंदोलन नहीं है. इसी सोच के कारण हिंदू, मुस्लिम, सरना, ईसाई, सिख और जैन समाज के लोग भी आंदोलन से जुड़े रहे.

पर्यावरण संरक्षण का संदेश : जंगलों से उनका गहरा जुड़ाव था. उन्होंने पेड़ों की कटाई का विरोध किया और लोगों को अधिक से अधिक पौधे लगाने के लिए प्रेरित किया. उनका मानना था कि जंगल बचेंगे तो आदिवासी समाज भी सुरक्षित रहेगा.

शिक्षा को बनाया बदलाव का हथियार : उन्होंने महसूस किया कि अशिक्षा की वजह से आदिवासी समाज का शोषण हो रहा है. इसी सोच के साथ उन्होंने नाइट स्कूल शुरू कर लोगों को शिक्षित करने का अभियान चलाया.

कैसे मिली ‘गुरुजी’ और ‘दिशोम गुरु’ की उपाधि

शिबू सोरेन का राजनीतिक कद भले ही राष्ट्रीय स्तर का हो गया था, लेकिन उनका जुड़ाव हमेशा गांव और आम लोगों से बना रहा. कोल्हान क्षेत्र उनकी कर्मभूमि माना जाता है. धनबाद के टुंडी क्षेत्र में उन्होंने लोगों को पढ़ाया, खेती और पशुपालन के लिए प्रेरित किया. यहीं से उन्हें ‘गुरुजी’ की पहचान मिली. जामताड़ा के चिरूडीह गांव में महाजनी प्रथा के खिलाफ उनका आंदोलन झारखंड की राजनीति का बड़ा मोड़ साबित हुआ. 1970 के दशक में जब स्थानीय महाजन और सूदखोर आदिवासियों की जमीनों पर जबरन कब्जा कर रहे थे, तब शिबू सोरेन आदिवासियों के हकों की रक्षा के लिए आगे आए. ग्रामीण क्षेत्रों में उनके संघर्ष, लोगों को एकजुट करने की क्षमता और फौरन न्याय करना ने उन्हें आदिवासियों का सर्वोच्च मार्गदर्शक बना दिया, जिसके बाद उन्हें ‘दिशोम गुरु’ कहा जाने लगा.

बीमारी से जूझते हुए कहा दुनिया को अलविदा

दिशोम गुरु शिबू सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक संरक्षक रहे और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने. केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी निभाई. वे लंबे समय से किडनी की बीमारी समेत कई स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे. बेहतर इलाज के लिए उन्हें दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कराया गया था. 4 अगस्त 2025 को 81 वर्ष की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली.

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