विजन डॉक्यूमेंट (2026-2029) और ‘विकसित भारत संकल्प’ अभियान के तहत देश भर के सभी शिक्षण संस्थानों स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के आसपास 500 मीटर के दायरे को पूरी तरह से नशामुक्त क्षेत्र (ड्रग-फ्री जोन) घोषित करने का नया प्रस्ताव रखा गया है.
नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने हाल ही में अपने विजन डॉक्यूमेंट (2026-2029) और ‘विकसित भारत संकल्प’ अभियान के तहत देश भर के सभी शिक्षण संस्थानों स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के आसपास 500 मीटर के दायरे को पूरी तरह से नशामुक्त क्षेत्र (ड्रग-फ्री जोन) घोषित करने का नया प्रस्ताव रखा है.
इसके साथ ही, सरकारी वित्तीय सहायता पाने वाले उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों की स्वैच्छिक सहमति से स्क्रीनिंग (नशा परीक्षण) कराने का प्रावधान भी शामिल किया गया है. मंशा यह है कि युवा पीढ़ी को नशामुक्त माहौल देकर देश की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा प्रदान की जा सके.
हालांकि इस विषय को लेकर पूर्व के आदेशों का कभी सटीक अनुपालन जमीन पर नहीं हो सका है. आज भी पूजा स्थल, स्कूल आदि के पास दुकानों में नशा की बिक्री आम बात है. अब देखने वाली बात होगी कि नया प्रस्ताव जमीनी स्तर पर कितना अमल में आ पाता है.
पूर्व के सख्त निर्देशों की ज़मीनी अनदेखी
नीतियों का मसौदा भले ही आशाजनक दिखता हो, लेकिन जमीनी हकीकत का अवलोकन करने पर एक बड़ा अंतर उजागर होता है. यह पहला मौका नहीं है जब शिक्षण संस्थानों को तंबाकू और मादक पदार्थों से दूर रखने के लिए कानून या नियम बनाए गए हैं. कोटपा (COTPA) अधिनियम, 2003 की धारा 6(b) के अनुसार, किसी भी विद्यालय या शैक्षणिक संस्थान के 100 गज (लगभग 90 मीटर) के दायरे में तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर पहले से ही वैधानिक प्रतिबंध लागू है.
तथापि, इस पुराने नियम का पालन भी अधिकतर क्षेत्रों में कागजों तक ही सीमित रहा है:
खुलेआम बिक्री: देश के अधिकांश शहरों और कस्बों में प्राथमिक विद्यालयों से लेकर बड़े महाविद्यालयों के मुख्य द्वारों के ठीक बाहर या चंद कदमों की दूरी पर पान की गुमटियां और खोखे निर्बाध रूप से संचालित हो रहे हैं.
निगरानी का अभाव: स्थानीय प्रशासन, पुलिस और आबकारी विभागों द्वारा नियमित जांच अभियान न चलाए जाने के कारण विक्रेता बिना किसी भय के सिगरेट, गुटका और अन्य नशीली सामग्रियां बेचते हैं.
प्रस्तावित बनाम वास्तविक स्थिति: एक तरफ सरकार पाबंदी का दायरा 100 गज से बढ़ाकर 500 मीटर (आधा किलोमीटर) करने का नया रोडमैप तैयार कर रही है, वहीं दूसरी तरफ न्यूनतम दूरी के पुराने मानक का उल्लंघन हर रोज सामने आता है.
तुलनात्मक विश्लेषण : नया आदेश बनाम वर्तमान व्यवस्था
| पहलू | केंद्र सरकार का नया आदेश (2026-2029) | वर्तमान जमीनी स्थिति |
| नशामुक्त दायरे की सीमा | शैक्षणिक संस्थान के चारों ओर 500 मीटर का प्रतिबंध. | 100 गज की पुरानी सीमा का भी सुचारू रूप से पालन नहीं. |
| प्रतिबंधित वस्तुएं | तंबाकू, शराब, गुटका और सभी प्रकार के नशीले पदार्थ. | मुख्य द्वारों के निकट तंबाकू व सिगरेट आसानी से उपलब्ध. |
| छात्र कल्याण व जांच | उच्च शिक्षण संस्थानों में सहमति से ड्रग स्क्रीनिंग टेस्ट का प्रस्ताव. | जागरूकता अभियानों की कमी और नियमित निगरानी का अभाव. |
| कार्यान्वयन तंत्र | तीन वर्ष का व्यवस्थित और समयबद्ध रोडमैप. | अंतर-विभागीय समन्वय की कमी और लचर ढर्रा. |
प्रशासनिक ढिलाई और आगे की चुनौती
नीतियों को कागजी घोषणाओं से निकालकर धरातल पर उतारने के लिए केवल नए दिशानिर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं है. जब तक स्थानीय निकायों, पुलिस प्रशासन और शैक्षणिक प्रबंधनों को जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक 100 मीटर की जगह 500 मीटर का दायरा तय करने से स्थितियां नहीं बदलेंगी.
नए आदेश को प्रभावी बनाने हेतु कड़ी चालान कार्रवाई, गुमटियों का नियमित अतिक्रमण हटाओ अभियान तथा डिजिटल निगरानी तंत्र स्थापित करना अनिवार्य है. इसके बिना, कागजों पर लिखे नशामुक्त क्षेत्र के नियम जमीनी सच्चाई के आगे बेअसर ही साबित होंगे.
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