रांची. झारखंड और ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में दशकों से खौफ का दूसरा नाम रहे माओवादी संगठन के खिलाफ सुरक्षा बलों ने अब तक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक सफलता हासिल की है. भाकपा माओवादी के शीर्ष पोलित ब्यूरो सदस्य और ₹2.20 करोड़ के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा को उसके दो सहयोगियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया है. वहीं, दूसरी ओर लाल आतंक के गढ़ कहे जाने वाले सारंडा के जंगलों से 24 नक्सलियों ने एक साथ पुलिस के सामने हथियार डाल दिए हैं. शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी और कैडरों के एकमुश्त सरेंडर के इस दोहरे प्रहार ने झारखंड और ओडिशा में नक्सली आंदोलन की रीढ़ पूरी तरह तोड़ दी है.
मनियाडीह में चेकिंग के दौरान धराया 40 साल पुराना मास्टरमाइंड
केंद्रीय खुफिया एजेंसियों, झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और झारखंड जगुआर के साझा रणनीतिक ऑपरेशन के तहत मिसिर बेसरा को धनबाद और गिरिडीह की सीमा पर स्थित मनियाडीह इलाके से दबोचा गया. वह अपने दो सहयोगियों के साथ वाहन में सवार होकर गिरिडीह की तरफ भागने की फिराक में था.
मूल रूप से गिरिडीह के पीरटांड़ का रहने वाला मिसिर बेसरा पिछले लगभग 40 वर्षों से माओवादी संगठन में सक्रिय था और देश भर में भाकपा माओवादी का अंतिम बचा हुआ पोलित ब्यूरो सदस्य था. उस पर झारखंड में ₹1 करोड़ तथा ओडिशा में ₹1.20 करोड़ यानी कुल ₹2.20 करोड़ का इनाम घोषित था. झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में उसके खिलाफ 150 से अधिक जघन्य आपराधिक मामले दर्ज हैं.
लखीसराय जेल ब्रेक का मास्टरमाइंड और ढहते नक्सली गढ़
मिसिर बेसरा का इतिहास बेहद आपराधिक और चालाक रहा है. उसे सितंबर 2007 में भी पकड़ा गया था, लेकिन 2009 में नक्सलियों ने लखीसराय कोर्ट परिसर पर दुस्साहसिक हमला कर उसे छुड़ा लिया था. इसके बाद से ही वह बूढ़ापहाड़, कोल्हान और सारंडा के दुर्गम जंगलों को अपना ठिकाना बनाकर समानांतर सत्ता चला रहा था.
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने ‘ऑपरेशन डबल बुल’ और ‘ऑपरेशन थंडरस्टॉर्म’ के जरिए बूढ़ापहाड़ और कोल्हान से नक्सलियों के सफाए का अभियान चलाया, जिससे मिसिर बेसरा अलग-थलग पड़ गया था. हाल ही में आत्मसमर्पण करने वाले कैडरों से मिली खुफिया सटीक जानकारी के आधार पर इस बार सुरक्षा बलों ने उसे बिना एक भी गोली चलाए घेर लिया.
सारंडा में 24 कैडरों का सरेंडर, लाल आतंक के अंत पर अंतिम मुहर
एक तरफ जहां शीर्ष कमांडर मिसिर बेसरा को कड़ी सुरक्षा के बीच रांची लाकर पूछताछ की जा रही है, वहीं सारंडा क्षेत्र में सक्रिय 24 नक्सलियों के एक साथ आत्मसमर्पण ने यह साबित कर दिया है कि संगठन में अब न तो नेतृत्व बचा है और न ही कैडरों का हौसला.
शीर्ष नेतृत्व का पकड़ा जाना और जमीनी कैडरों का मुख्यधारा में लौटना स्पष्ट संकेत देता है कि झारखंड और ओडिशा के जंगलों में चार दशकों से जारी नक्सल आंदोलन अब अपने अंतिम दिन गिन रहा है. पुलिस अधिकारियों के अनुसार, यह संयुक्त कार्रवाई क्षेत्र में स्थायी शांति और विकास की एक नई सुबह की शुरुआत है.
- झारखंड-ओडिशा में नक्सलवाद के अंत की पटकथा: 2.20 करोड़ का इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा गिरफ्तार, 24 कैडरों के सरेंडर से टूटी माओवादियों की कमर - July 29, 2026
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