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Home » स्वास्थ्य विभाग बेहाल : जिले में मलेरिया से सातवीं मौत, पोटका प्रभारी सस्पेंड, सिविल सर्जन की कब तय होगी जिम्मेदारी!
ओसियन स्पेशल

स्वास्थ्य विभाग बेहाल : जिले में मलेरिया से सातवीं मौत, पोटका प्रभारी सस्पेंड, सिविल सर्जन की कब तय होगी जिम्मेदारी!

Ocean News DeskBy Ocean News DeskJuly 9, 2026
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  • मलेरिया का कहर और प्रशासनिक शिथिलता, कनिष्ठ को ‘बलि का बकरा’ बना अपनी विफलता छुपा रहा शीर्ष नेतृत्व

जमशेदपुर. पूर्वी सिंहभूम जिला इन दिनों मलेरिया और स्वास्थ्य विभाग की प्रशासनिक नाकामी के दोहरे दंश से जूझ रहा है. जिले में मलेरिया का प्रकोप इतना बढ़ चुका है कि अब तक एक पांच वर्षीय मासूम बच्ची सहित कुल सात लोगों की मौत हो चुकी है.

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पोटका सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के प्रभारी डॉ रजनी महाकुड़ को निलंबित कर दिया है. उनकी जगह सिविल सर्जन डॉ साहिर पाल ने डॉ सुशांत सीट को प्रभारी नियुक्ति किया है.

लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या केवल एक जमीनी स्तर के कनीय अधिकारी पर गाज गिरा देने से स्वास्थ्य विभाग अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकता है? इस पूरे घटनाक्रम में जिले के मुख्य स्वास्थ्य स्वास्थ्य अधिकारी यानी सिविल सर्जन की प्रशासनिक शिथिलता और जवाबदेही सबसे बड़े घेरे में है.

यहां यह बताना लाजिमी है कि राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था की कमान मंत्री डॉ इरफान अंसारी के हाथों में है, तो वहीं पूर्वी सिंहभूम जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने का सीधा जिम्मा सिविल सर्जन डॉ साहिर पाल पर है, जिन्हें मंत्री का बेहद विश्वस्त माना जाता है.

पोटका CHC प्रभारी पर कार्रवाई और धरातल की हकीकत

विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जिले में अब तक 12,518 लोगों की मलेरिया जांच की जा चुकी है, जिसमें से 128 मरीज संक्रमित पाए गए हैं. सबसे भयावह स्थिति पोटका क्षेत्र की है, जहां अकेले जांच के दौरान 25% लोग मलेरिया पॉजिटिव मिले हैं. इसके अलावा डुमरिया, पटमदा और गुड़ाबांदा जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी संक्रमण तेजी से फैल रहा है.

पोटका में स्थिति नियंत्रण से बाहर होने और विभागीय कार्यों में घोर लापरवाही बरतने के आरोप में वहां के सीएचसी प्रभारी को निलंबित कर दिया गया है. एमजीएम अस्पताल में भी वर्तमान में कई गंभीर मरीजों का इलाज चल रहा है, जिनमें से कुछ वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं.

सिविल सर्जन की जिम्मेदारी तय होना क्यों अनिवार्य है?

एक अनुमंडल या प्रखंड स्तर के चिकित्सा पदाधिकारी का निलंबन इस बात का प्रमाण है कि निचले स्तर पर काम ठीक से नहीं हो रहा था. परंतु, किसी भी जिले के स्वास्थ्य ढांचे की निगरानी, दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना, और फॉगिंग व जागरूकता अभियानों का खाका तैयार करना सीधे तौर पर सिविल सर्जन (Civil Surgeon) के क्षेत्राधिकार और कर्तव्यों में आता है. सवाल यह उठता है कि क्या इस विफलता के लिए सिविल सर्जन की जवाबदेही नहीं तय की जानी चाहिए, क्योंकि जाे सामने है उसमें …

निगरानी और दूरदर्शिता का अभाव : मलेरिया जैसी बीमारियां मौसमी होती हैं. बारिश के मौसम की शुरुआत से पहले प्री-मानसून तैयारियां (जैसे एंटी-लार्वा का छिड़काव, जागरूकता अभियान) क्यों नहीं पुख्ता की गईं? यदि पोटका में संक्रमण की दर 25% तक पहुंच गई, तो जिला मुख्यालय स्तर पर इसकी समय रहते समीक्षा क्यों नहीं की गई?

दवाओं और संसाधनों की कमी : शहर में सदर अस्पताल से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार यह शिकायतें आ रही हैं कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आवश्यक रैपिड एंटीजन किट और मलेरिया रोधी दवाओं की किल्लत है. इन संसाधनों की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित कराना पूरी तरह से सिविल सर्जन का प्रशासनिक दायित्व है.

भ्रामक रिपोर्टिंग और डेटा अपडेट में देरी : जिला प्रशासन द्वारा डेटा अपडेट में लापरवाही बरतने के लिए ‘शो-कॉज’ (कारण बताओ नोटिस) जारी किया गया है. स्वास्थ्य विभाग का मुखिया होने के नाते सिविल सर्जन के सुपरविजन के बिना इतनी बड़ी लापरवाही संभव नहीं है.

उपायुक्त (DC) का कड़ा रुख, 4 दिन में 1 लाख जांच का लक्ष्य

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिले के उपायुक्त ने कड़ा रुख अपनाया है. उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को अल्टीमेटम देते हुए चार दिनों के भीतर एक लाख लोगों की मलेरिया जांच करने का महत्वाकांक्षी निर्देश दिया है. इसके साथ ही, अब तीन दिन से अधिक समय से बुखार से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए मलेरिया जांच को अनिवार्य कर दिया गया है.

उपायुक्त की यह त्वरित सक्रियता सराहनीय है, लेकिन यह निर्देश भी सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि स्वास्थ्य विभाग का शीर्ष नेतृत्व यानी सिविल सर्जन कार्यालय जमीनी स्तर पर संकट को भांपने और स्वतरू कार्रवाई करने में पूरी तरह विफल रहा है.

कनिष्ठ को बना दिया बलि का बकरा

पोटका प्रभारी का निलंबन बीमारी के लक्षणों का इलाज करने जैसा है, जबकि बीमारी की जड़ प्रशासनिक शिथिलता है. जब तक पूर्वी सिंहभूम के सिविल सर्जन की भूमिका और उनकी जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक व्यवस्था में वास्तविक सुधार होना नामुमकिन है. मासूमों की जान की कीमत पर केवल निचले कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर शीर्ष अधिकारी अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते. जिला प्रशासन को चाहिए कि वह इस स्वास्थ्य आपातकाल के लिए जवाबदेही की शुरुआत ऊपर से करे.

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