“2 करोड़ रुपये नकद और 20% का फिक्स्ड कमीशन!” युवाओं के भविष्य का सौदा करने वाले जेपीएससी के पूर्व अध्यक्ष एल. ख्यांगते की आलीशान कुर्सी से जेल की सलाखों तक पहुंचने की पूरी दास्तान. जानिए कैसे परीक्षा पास कराने के इस बड़े प्रशासनिक व वित्तीय महाघोटाले का पर्दाफाश हुआ.
रांची. झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की परीक्षाओं की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल हैं. आपराधिक अनुसंधान विभाग (CID) द्वारा की जा रही गहन जांच में एक सुनियोजित और बड़े पैमाने पर चल रहे भ्रष्टाचार रैकेट का जो खुलासा हुआ है वह चौकाने वाला है. राज्य के पूर्व मुख्य सचिव और जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते तथा परीक्षा संचालन एजेंसी TDPL कंपनी के बीच तय हुई ‘2 करोड़ रुपए और 20% कमीशन’ की एक डील ने कैसे उन्हें आलीशान कुर्सी से सीधे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.
डील की शुरुआत: मुख्य सचिव के आवास से बिचौलिये की एंट्री
इस पूरे खेल की सुई तब घूमी जब गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट प्रखंड के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (BSO) एवं टीडीपीएल के मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी ने सीआईडी (CID) के समक्ष अपना सनसनीखेज कबूलनामा दिया. टीडीपीएल कंपनी को जेपीएससी में ओटीएस, ओएमआर स्कैनिंग, ओएसएम, एडमिट कार्ड जेनरेशन और अटेंडेंस शीट प्रिंटिंग जैसे बेहद गोपनीय और संवेदनशील कार्यों का ठेका दिलाने में मुख्य मध्यस्थ (बिचौलिया) की भूमिका राज्य के मुख्य सचिव के आधिकारिक आवास में कार्यरत कर्मी धर्मेंद्र ने निभाई. धर्मेंद्र ने टीडीपीएल को ठेका दिलाने और बदले में कुछ चहेते अभ्यर्थियों को अवैध रूप से परीक्षा पास कराने के एवज में खुद के लिए 20 से 25 लाख रुपए बतौर कमीशन तय किए.
होटल रैडिसन ब्लू से लेकर मोरहाबादी मैदान तक तय हुई शर्तें
टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह और सत्यपाल सिंह जब इस प्रस्ताव के लिए तैयार हो गए, तब कंपनी के कागजात धर्मेंद्र को सौंपे गए. इसके बाद जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते के साथ होटल रैडिसन ब्लू के सामने स्थित रेस्तरां में एक गुप्त बैठक हुई, जहाँ अध्यक्ष ने कंपनी की कार्यक्षमता का जायजा लिया.
इस पूरे खेल में पूर्व मुख्य सचिव के आधिकारिक आवास पर कार्यरत कर्मी धर्मेंद्र मुख्य मध्यस्थ की भूमिका में था. धर्मेंद्र ने ही टीडीपीएल कंपनी के प्रबंधकों और तत्कालीन अध्यक्ष के बीच की कड़ी का काम किया.
औपचारिक प्रजेंटेशन के बाद, झारखंड में छात्र आंदोलन के केंद्र रहे मोरहाबादी मैदान और उसके बाद स्टेट गेस्ट हाउस में अगली बैठकें हुईं. यहीं पर यह फाइनल हुआ कि चेयरमैन एल. ख्यांगते को ठेके के एवज में 2 करोड़ रुपए नकद दिए जाएंगे और साथ ही कंपनी को मिलने वाली कुल बिलिंग का 20 प्रतिशत हिस्सा लगातार कमिशन के रूप में अध्यक्ष तक पहुंचाया जाएगा. इस सुनियोजित साठगांठ का परिणाम यह सामने आया कि जून 2025 में टीडीपीएल को जेपीएससी परीक्षाओं का एग्रीमेंट और वर्क ऑर्डर मिल गया.
विवाद, खुलासे और ‘डील से जेल तक’ का सफर
इस भ्रष्टाचार का गुबार तब फूटा जब 14वीं सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम 2 जुलाई को घोषित हुआ. श्रेणीवार कटऑफ जारी न होने और सोशल मीडिया पर केवल 48 सवाल भरकर एक अभ्यर्थी के चयन की वायरल ओएमआर शीट ने राज्यभर के युवाओं में आग लगा दी. डुमरी विधायक जयराम महतो द्वारा मुख्यमंत्री को पत्र लिखने और छात्रों के उग्र विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार हरकत में आई.
20 जुलाई को तत्कालीन अध्यक्ष एल. ख्यांगते ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे राज्यपाल ने अगले ही दिन स्वीकार कर लिया और सीआईडी ने तुरंत एफआईआर दर्ज कर ली. सीआईडी द्वारा जेपीएससी मुख्यालय, टीडीपीएल कार्यालयों और पूर्व चेयरमैन के आवास पर की गई ताबड़तोड़ छापेमारी के बाद इस नेटवर्क से जुड़े एक-एक मोहरे को दबोचा जाने लगा.
जांच के दौरान पूर्व चेयरमैन एल. ख्यांगते से लंबी पूछताछ की गई, जिसके बाद कानूनी शिकंजा कसता चला गया. इस बहुचर्चित प्रकरण में अब तक टीडीपीएल के निदेशक रामवीर सिंह, मार्केटिंग मैनेजर अभय तिवारी, एकाउंटेंट रक्षक सिंह, तकनीकी प्रोग्रामर उस्मान और एबाद समेत कुल 19 लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं. वहीं, आयोग की ओर से उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता, कर्मी सोनू कुमार और मुख्य बिचौलिया कंप्यूटर ऑपरेटर धर्मेंद्र कुमार पहले ही सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं.
2 करोड़ की इस भारी-भरकम डील के बूते कुर्सियों पर काबिज होकर युवाओं के भविष्य का सौदा करने वाले पूर्व अध्यक्ष एल. ख्यांगते को आखिरकार कानूनी जांच और पुख्ता सबूतों के आधार पर सदर अस्पताल में मेडिकल जांच के बाद सोमवार को जेल भेज दिया गया. यह संपूर्ण घटनाक्रम इस बात का जीवंत उदाहरण है कि सत्ता और पद का दुरुपयोग कर युवाओं के सपनों को रौंदने वालों का अंत आखिरकार जेल की सलाखों के पीछे ही होता है.


