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Home » प्रबंध संपादक की कलम से : छात्र आंदोलन में सरकार की रणनीतिक चूक से बढ़ता सियासी संकट
ओसियन स्पेशल

प्रबंध संपादक की कलम से : छात्र आंदोलन में सरकार की रणनीतिक चूक से बढ़ता सियासी संकट

Ocean News DeskBy Ocean News DeskAugust 11, 2026
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सड़कों पर उतरते युवा, विधानसभा घेराव के दौरान हुआ लाठीचार्ज और फिर राज्यव्यापी ‘झारखंड बंद’ ये घटनाएं इस ओर इशारा करतीं है कि मामला बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है. छात्रों के विरोध प्रदर्शन और मांगों के बीच सरकार की रणनीतिक चूक से मुद्दा उसके हाथ से सरककर विपक्ष के पाले में चला गया प्रतीत हाेता है…

झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं (JPSC-JSSC) में कथित धांधली को लेकर उभरा छात्र आंदोलन अब केवल अभ्यर्थियों के आक्रोश तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राज्य की राजनीति का मुख्य केंद्र बन चुका है. सड़कों पर उतरते युवा, विधानसभा घेराव के दौरान हुआ लाठीचार्ज और तत्पश्चात आयोजित राज्यव्यापी ‘झारखंड बंद’ ये सभी घटनाएं इस बात की तस्दीक करती हैं कि मामला बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है.

हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का गहन विश्लेषण करने पर एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है: यह स्थिति मुख्य रूप से झारखंड सरकार की प्रशासनिक सुस्ती और रणनीतिक चूक का परिणाम है, जिसने एक निष्पक्ष मांग को राजनीतिक हथियार बनाने का अवसर विपक्ष की झोली में डाल दिया.

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सालों का वक्त खपाने वाले युवाओं की मांगें शुरुआती चरण में कोई बहुत जटिल या असाध्य नहीं थीं. पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, धांधली की निष्पक्ष जांच और भविष्य के लिए एक ठोस रोडमैप, ये ऐसे बुनियादी विषय थे जिन्हें समय रहते और आपसी मेज-वार्ता के माध्यम से आसानी से सुलझाया जा सकता था. परंतु, सरकार के स्तर पर हुआ अनावश्यक विलंब और आंदोलनकारी छात्रों को विश्वास में न लेने की प्रवृत्ति ने असंतोष की आग में घी डालने का काम किया. जब छात्रों के मन में अविश्वास बढ़ता गया, तो सड़कों पर आक्रोश का फूटना लाज़मी था.

इस गतिरोध को हल करने के लिए सरकार ने जो प्रक्रिया अपनाई, उसमें भी समन्वय और दूरदर्शिता का अभाव दिखा. सिर्फ बयानबाजी जारी करने या विभिन्न दलों के विधायकों को शामिल कर बातचीत का ड्राफ्ट तैयार करने से स्थिति सुधरने की बजाय और उलझ गई. इस बहुदलीय वार्ता प्रणाली से सरकार के अपने फैसलों में असमंजस और हिचकिचाहट साफ नजर आई, जिससे अभ्यर्थियों के मन में यह संदेश गया कि सरकार ठोस निर्णय लेने की जगह उलझनें बढ़ा रही है. इससे अविश्वास की खाई और चौड़ी हुई.

बढ़ते जनाक्रोश और आंदोलन के भारी दबाव के बीच JPSC चेयरमैन की गिरफ्तारी जैसे कड़े कदम ज़रूर उठाए गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. यदि सरकार शुरुआती दौर में ही सीबीआई (CBI) जांच की सिफारिश करने या भविष्य की परीक्षाओं के लिए सख्त कानून बनाने जैसी ठोस घोषणाएं कर छात्रों से सीधा संवाद कायम करती, तो युवाओं को भरोसा दिया जा सकता था. किंतु, संवादहीनता और फैसलों में देरी के कारण यह मामला हाथ से फिसलता चला गया और एक विशुद्ध छात्र आंदोलन को राजनीतिक रूप देने के लिए विपक्ष को खुला मैदान मिल गया.

परिणामस्वरूप, जो मुद्दा टेबल-टॉक से शांत हो सकता था, वह विधानसभा के बाहर लाठीचार्ज, पानी की बोछारों और राज्यव्यापी बंद की परिणति के रूप में सामने आया. कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किए गए पुलिसिया बल प्रयोग ने राज्य सरकार की छवि को युवाओं के बीच और अधिक असहज स्थिति में खड़ा कर दिया. इसके अलावा, राज्य सरकार की सहयोगी पार्टी कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व द्वारा लाठीचार्ज की घटना पर सीधे रुख साफ न करने और मुखर आलोचना से दूरी बनाने जैसे घटनाक्रमों ने भी कई सवाल खड़े किए हैं.

विपक्ष ने इस रणनीतिक विफलता को भांपने में ज़रा भी देर नहीं की और इसे एक बड़ा राजनीतिक अवसर मानते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. आज स्थिति यह है कि विपक्षी दल सरकार की छवि को छात्र-विरोधी के रूप में पेश करने में काफी हद तक सफल दिखाई दे रहे हैं.

यह पूरा घटनाक्रम सरकार के लिए एक बड़ा सबक है. प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता से जूझ रहे युवाओं के गुस्से को केवल प्रशासनिक बयानों या सख्त पुलिसिया कार्रवाई से नियंत्रित नहीं किया जा सकता. यदि सरकार ने समय रहते रणनीतिक समझ, उचित समन्वय और सीधे संवाद का रास्ता चुना होता, तो इस विस्फोटक परिस्थिति से बचा जा सकता था और विपक्ष को इस संवेदनशील मुद्दे का राजनीतिकरण करने का मौका नहीं मिलता.

संजय कुमार, प्रबंध संपादक

इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक (प्रबंध संपादक) के निजी और विश्लेषणात्मक हैं. इससे संस्था या न्यूज पोर्टल के आधिकारिक रुख का पूरी तरह सहमत होना अनिवार्य नहीं है.  

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