रांची. झारखंड विधानसभा के आगामी मानसून सत्र के सुचारू संचालन को लेकर विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो की अध्यक्षता में बुधवार को उच्चस्तरीय सर्वदलीय बैठक संपन्न हुई. सत्र के आगाज से ठीक पहले हुई इस बैठक में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित सत्ता पक्ष एवं विपक्ष के प्रमुख दिग्गज शामिल हुए.
हालांकि पीठासीन अधिकारी ने सदन की गरिमा और लोकतांत्रिक परंपराओं का हवाला देते हुए सभी दलों से सकारात्मक सहयोग की अपील की है, किंतु राजनीतिक गलियारों में इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि इस बार का सत्र बेहद हंगामेदार औरचुनौतियों से भरा रहने वाला है.
जेपीएससी-जेएसएससी विवाद बनेगा मुख्य हथियार
सदन के पटल पर सरकार को घेरने के लिए विपक्षी दलों ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप दे दिया है. इस बार सबसे बड़ा और ज्वलंत मुद्दा राज्य की परीक्षाओं और नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों का है. हाल ही में जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं के परिणाम तथा मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर छात्रों का आक्रोश सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक उफान पर है. राजधानी रांची समेत विभिन्न जिलों में युवा सड़कों पर उतरकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं. विपक्षी खेमा इस मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाकर युवाओं के असंतोष को सदन के भीतर व्यक्त करने की फिराक में है, जिससे सत्ताधारी दल के लिए असहज स्थिति पैदा हो सकती है.
कानून व्यवस्था और नीतिगत मोर्चों पर चौतरफा घेराबंदी
युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों के अलावा प्रदेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था भी विपक्ष के तरकश का एक प्रमुख तीर होगी. राज्य के अलग-अलग हिस्सों में घटित आपराधिक घटनाओं और गिरती सुरक्षा व्यवस्था को आधार बनाकर विपक्षी विधायक सरकार की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े करेंगे.
इसके अतिरिक्त, नीतिगत निर्णय, प्रशासनिक सुस्ती और भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों पर भी तीखी नोकझोंक देखने को मिल सकती है. जानकारों का मानना है कि सत्ता पक्ष इन तमाम हमलों का जवाब देने के लिए अपनी पुरानी उपलब्धियों और केंद्रीय नीतियों की कमियों को ढाल बनाने की तैयारी कर चुका है, जिससे सदन के भीतर तीखी बहस तय मानी जा रही है.
अध्यक्ष की अपील बनाम राजनीतिक जमीन तलाशने की होड़
विधानसभा अध्यक्ष ने तमाम राजनीतिक दलों से यह आग्रह किया है कि वे जनता से जुड़े मुद्दों पर स्वस्थ चर्चा को प्राथमिकता दें ताकि जनहित से जुड़े विधेयकों और प्रस्तावों का समयबद्ध निष्पादन हो सके. इसके बावजूद, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के नजदीक आते इस अहम सत्र में कोई भी दल अपनी राजनीतिक जमीन कमजोर नहीं करना चाहेगा.
बहरहाल, सर्वदलीय बैठक में भले ही शांतिपूर्ण संचालन पर सहमति बन गई हो, लेकिन कार्यसूची शुरू होते ही सदन के भीतर राजनीतिक दलों के बीच तीखी तकरार और जोरदार घमासान छिड़ना लाजिमी है.



