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Home » केबुल कंपनी के मजदूरों के खाते में 2 से 10 लाख का ‘सस्पेंस’! क्या बकाये के नाम पर हो रहा बड़ा खेल? दांव पर लगी RP और वेदांता की साख!
कारोबार

केबुल कंपनी के मजदूरों के खाते में 2 से 10 लाख का ‘सस्पेंस’! क्या बकाये के नाम पर हो रहा बड़ा खेल? दांव पर लगी RP और वेदांता की साख!

SUMA KUMARBy SUMA KUMARJuly 16, 2026
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  • बिचौलियों की संदिग्ध सक्रियता, RP की अपारदर्शी व भेदभावपूर्ण नीति और वेदांता प्रबंधन की ‘अदृश्य उपस्थिति’ से भड़का आक्रोश
  • कानूनी पेचीदगियों में फंसा हजारों परिवारों का भविष्य. क्वार्टर खाली करने को भेजी नोटिस पर फंसा प्रबंधन, प्रशासन-सरकार को नहीं दी सूचना 
  • बड़ा सवाल : अगर राशि खाते में स्वीकार कर ली तो यह फूल-फाइनल सेटेलमेंट होगा, इस पर नेताओं के अलग-अलग विचार आ रहे  

जमशेदपुर. महानगर के औद्योगिक इतिहास का सबसे बड़ा प्रतीक रही इंकैब (केबुल) कंपनी के बंद होने के ढाई दशकों बाद, आज इसके नाम पर एक ऐसा रहस्यमयी खेल शुरू हो गया है जिसने कानूनी विशेषज्ञों से लेकर आम जनता तक को हैरत में डाल दिया है.

पिछले कुछ दिनों से बंद पड़ी कंपनी के मजदूरों के बैंक खातों में अचानक ‘बकाये भुगतान’ के नाम पर पैसे ट्रांसफर होने लगे हैं. किसी के खाते में 2 लाख, तो किसी के खाते में 10 लाख रुपये पहुंचे हैं. समान ग्रेड और सेवा वालों के भुगतान में भी अंतर आ रहा है.

प्रथम दृष्टया यह राहत की खबर लग सकती है, लेकिन धरातल पर इसने एक खौफनाक ‘सस्पेंस’ और आक्रोश को जन्म दे दिया है. मजदूरों का सीधा सवाल है कि जब कंपनी का कोई आधिकारिक प्रबंधन सामने नहीं है, तो यह पैसा कहां से आ रहा है और किस आधार पर बांटा जा रहा है? क्या यह भुगतान मजदूरों का हक है या फिर कंपनी की अरबों रुपये की कीमती जमीन को हथियाने के लिए पर्दे के पीछे खेला जा रहा कोई कॉर्पोरेट कार्ड?

दिलचस्प है कि रिजोल्यूशन प्लान के पूरा होने और टेकिंग ओवर की प्रक्रिया से पहले ही वेदांता के नाम पर सक्रिय टीम अवैध व अनैतिक कार्यों को अंजाम देने में जुटी हुई है. मजदूर नेताओं की चिंता यह है कि वेदांता अथवा RP की ओर से अब तक झारखंड सरकार, जिला प्रशासन अथवा श्रम विभाग को अधिग्रहण की जानकारी तक नहीं दी गयी ऐसे में वेदांता की वैधानिकता क्या है ?

आरपी (RP) की भेदभावपूर्ण नीति और अपारदर्शिता पर गंभीर सवाल

इस पूरे मामले में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), कोलकाता बेंच की प्रक्रिया के तहत नियुक्त रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (RP) टेबरीवाल की भूमिका सबसे बड़े विवाद के केंद्र में आ गई है. मजदूर नेताओं और श्रमिक संगठनों का आरोप है कि RP की नीतियां पूरी तरह से अपारदर्शी और भेदभावपूर्ण हैं.

भेदभावपूर्ण वितरण : एक ही श्रेणी और समान सेवा अवधि वाले मजदूरों के भुगतान में भारी अंतर देखा जा रहा है. किसी को 10 लाख मिले तो किसी को महज 2 लाख में समेट दिया गया. इस विसंगति का आधार क्या है, इसका कोई आधिकारिक जवाब नहीं है.

गोपनीयता का खेल: नियमानुसार, किसी भी बंद इकाई के पुनरुद्धार या परिसमापन (Liquidation) की प्रक्रिया के दौरान लेनदारों और श्रमिकों के बकाये का निर्धारण पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए. लेकिन यहां भुगतान से पहले न तो कोई लिस्ट जारी की गई और न ही किसी त्रिपक्षीय (प्रबंधन, प्रशासन और यूनियन) वार्ता का सहारा लिया गया. अगर ऐसा है भी तो इसकी जानकारी किसी स्तर पर नहीं सार्वजनिक की गयी है.

‘दलालों की पैठ’ और वेदांता की अदृश्य उपस्थिति

कंपनी गेट पर उमड़ रहा मजदूरों का सैलाब चीख-चीख कर एक ही सवाल पूछ रहा है”कौन है दलाल, सामने आए!” आरोप लग रहे हैं कि बंद कंपनी के भीतर कुछ स्थानीय बिचौलियों और स्वार्थी तत्वों का एक मजबूत सिंडिकेट सक्रिय हो चुका है. यह सिंडिकेट सीधे तौर पर आरपी के दफ्तर और बाहरी ताकतों के बीच एक सेतु का काम कर रहा है.

इस पूरे बवंडर के पीछे देश के प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट दिग्गज ‘वेदांता समूह’ की अदृश्य उपस्थिति बताई जा रही है. चर्चा है कि वेदांता की सांकेतिक एंट्री का रास्ता साफ करने के लिए ही यह ‘टोकन मनी’ का खेल रचा गया है. मजदूर नेताओं का कहना है कि वेदांता जैसी बड़ी कंपनी को सामने आकर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए. पर्दे के पीछे रहकर, बिचौलियों के दम पर अरबों की औद्योगिक जमीन को टेकओवर करने की यह कोशिश वेदांता जैसे बड़े समूह की साख को बट्टा लगा रही है.

कानूनी पेचीदगियों में उलझा मजदूरों का भविष्य

कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह पूरा घटनाक्रम भारी पेचीदगियों से भरा है. इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड (IBC) और CIRP के तहत किसी भी रेजोल्यूशन प्लान को NCLT से मिली मंजूरी की सभी शर्तों को निर्धारित समय अवधि में पूरा करना अनिवार्य है. मजदूर नेताओं का कहना है कि अब तक जो प्लान स्वीकृत हुआ है वह शर्तों के साथ है जो पूरा नहीं होने के बावजूद RP के कृत्य को उन्होंने NCLAT में चुनौती दे रखी है, उसकी सुनवाई से पहले पैसा भेजने से टेबरीवाल की संदिग्ध मंशा उजागर हो चुकी है.

अवैध भुगतान का संशय : यदि रेजोल्यूशन प्लान को अभी तक पूर्ण कानूनी मान्यता नहीं मिली है, तो अंतरिम रूप से चुनिंदा खातों में यह आंशिक भुगतान किस कानूनी प्रावधान के तहत किया जा रहा है ? जब COC गठन से लेकर तमाम बिंदुओं को NCLAT में पहले ही चुनौती दी जा चुकी है. भुगतान के अलावा टेक ओवर का प्लॉन क्या है?

दावों का सेटलमेंट: क्या इस राशि को स्वीकार करने के बाद मजदूरों का पूर्ण और अंतिम दावा (Full and Final Settlement) मान लिया जाएगा? मजदूरों को डर है कि यह जाल उन्हें उनके वास्तविक हक (पूरी ग्रेच्युटी, पीएफ और एरियर) से वंचित करने के लिए बुना गया है. कइयों ने तो कानूनी तौर पर इस संदिग्ध राशि को स्वीकार करने से भी इनकार करने की चेतावनी दी है. वर्तमान में कंपनी में ऑनरोल कर्मचारियों की चिंता अलग है. उनकी सर्विस  लेकर अब तक के अंतिम बकाये पर भी अलग-अलग राय सामने आ रहे है जो पूरी स्थिति को संदिग्ध बना रहे.

आर-पार की जंग,  उग्र आंदोलन की चेतावनी

25 सालों से पाई-पाई को तरस रहे और अपने साथियों को आंखों के सामने दम तोड़ते देख चुके केबुल कंपनी के कर्मचारियों का धैर्य अब पूरी तरह टूट चुका है. गेट पर डटे कर्मचारियों और मृत श्रमिकों के आश्रितों ने स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है:

“जब तक जीवित और मृत, हर एक मजदूर के बकाये का एकमुश्त पारदर्शी भुगतान (One-Time Settlement) सुनिश्चित नहीं हो जाता और बिचौलियों को बाहर नहीं किया जाता, तब तक किसी भी बाहरी एजेंसी या वेदांता को केबुल कंपनी की एक इंच जमीन पर भी कदम नहीं रखने दिया जाएगा.”

यह आक्रोश अब केवल एक औद्योगिक विवाद नहीं रहा, बल्कि शहर की कानून-व्यवस्था के लिए एक टाइम बम बन चुका है. यदि आरपी, वेदांता प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन ने तुरंत सामने आकर स्थिति स्पष्ट नहीं की, तो जमशेदपुर के इतिहास में एक बड़े और अभूतपूर्व जन-आंदोलन की चिंगारी सुलगना तय है.

दो गुटों में बंटा नजर आ रहा आंदोलन

केबुल कंपनी के मजदूरों का यह आंदोलन अब वैचारिक रूप से दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है. पहला गुट सेवानिवृत्त कर्मचारियों का है, जो अपने बकाये और क्वार्टर की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं. वहीं दूसरा गुट ऑन-रोल कर्मचारियों का है, जो रिटायर नेताओं की भूमिका को संदिग्ध मान रहा है. ऑन-रोल गुट का दावा है कि वेदांता कंपनी चालू होने पर उन्हें सेवा में वापस लेगी, हालांकि वेदांता प्रबंधन की चुप्पी से यह दावा फिलहाल खोखला दिख रहा है. दूसरी ओर, रिटायर नेता इस धड़े को ‘कॉर्पोरेट कार्ड’ का हिस्सा और दलाल बता रहे हैं.

केबुल कर्मचारी की राय, कड़वी सच्चाई… सोशल मीडिया में

केबुल कंपनी में तथाकथित नये प्रमोटर वेदांता ने लुकाछिपी के खेल की तरह लिटमस टेस्ट किया! प्रमोटर द्वारा किया गया प्रयास गर्म शांत दोसा के तवे पर पानी की बूंदें छिंटने जैसा था! कर्मचारियों के किये गये क्लेम राशि का मात्र 5% प्रतिशत किसी अज्ञात योजना की तरह कुछ कर्मचारियों के खाते में वगैर किसी पूर्व सूचना और बातचीत के ट्रांसफर कर दिया गया जो साबित करता है कि यह प्रमोटर भी पिछले तीन चार फरेबी प्रमोटरों की तरह हीं किसी गुप्त योजना और मंशा के तहत हीं कार्यरत है!
राजेंद्र कुमार

पर अब वक्त बदल चुका है! 2001 से 2010 के दशक में वेतन बंद हो जाने की स्थिति में केबुल कंपनी के कर्मचारी दया और सहानुभूति के पात्र थे! जो बुजुर्ग थे वो दुर्भिक्ष में स्वर्ग सिधार गये! जो कुछ कम उम्र के थे उन्होंने भला बुरा अपनी जिविका का रास्ता निकाल लिया! जो प्रौढ़ थे समय के साथ उनकी अगली पीढ़ी ने पारिवारिक जीवन को आगे आकर संभाल लिया!

अगले पांच वर्षों में केबुल कंपनी के सारे बाकी बचे कर्मचारी भी साठ वर्षों के होकर रिटायर हो जायेंगे! अब इस कंपनी के चलने या नहीं चलने से किसी कर्मचारी या उसके परिवार को कोई लाभ नहीं है! और आधुनिक ठगी के दौर में भविष्य के लिए दिखाया जाने वाला सब्जबाग एक धोखा हीं साबित होगा!

तो इधर उधर से जुटाये गये अलग अलग कंपनियों के रिटायर्ड, अपनी जिविका चलाने के लिए जमा हुए पदाधिकारियों से यह नम्र निवेदन है कि कोई ऐसा कार्य कॉलोनी स्तर पर ना करें जिससे बड़े दुख और दर्द से मुश्किल से बाहर निकले कर्मचारियों का पारिवारिक, सामाजिक जीवन और यहां की शांति भंग हो!! अब दया का पात्र कोई नहीं है और आपके फेंके हुए पैसे को उठाने की लालसा किसी भी कर्मचारी के मन में नहीं है! जब जरूरत थी, तो किसी ने हाथ नहीं थामा! अब तो जरूरत हीं नहीं रही किसी प्रमोटर की!
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