नई दिल्ली: देश में बार-बार विधायकों और सांसदों के पाला बदलने और पूरी की पूरी पार्टी के ‘विलय’ (Merge) के नाम पर सरकारें बनाने-गिराने के खेल पर अब देश की सर्वोच्च अदालत में बड़ी सुनवाई होने जा रही है. वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने संविधान की 10वीं अनुसूची यानी ‘दल-बदल विरोधी कानून’ (Anti-Defection Law) की मौजूदा व्याख्या को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. इस याचिका पर गंभीरता दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
क्या है पूरा मामला?
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कपिल सिब्बल की याचिका पर सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि इस विषय के कई पहलुओं पर संसद को भी विचार करने की आवश्यकता हो सकती है. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने खुद पक्षकार बनकर यह याचिका दायर की है. उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि कानून के पैराग्राफ 4 के तहत मिलने वाली ‘विलय’ की छूट का गलत इस्तेमाल हो रहा है.
सिब्बल ने अदालत के सामने चिंता जताते हुए कहा, “मौजूदा व्याख्या के कारण देश की राजनीति पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है. इसके जरिए रातों-रात कोई अल्पसंख्यक पार्टी बहुमत में आ जाती है, तो कभी बहुमत वाली पार्टी अचानक अल्पसंख्यक बन जाती है.”
Goa मामले के साथ जुड़ी याचिका
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि गोवा में विधायकों के दल-बदल से जुड़ा एक इसी तरह का मामला पहले से ही शीर्ष अदालत में लंबित है. इसके बाद बेंच ने सिब्बल की इस याचिका को भी गोवा वाले मामले के साथ टैग (जोड़) दिया है, ताकि दोनों पर एक साथ व्यापक सुनवाई हो सके.
क्यों पड़ी इस चुनौती की जरूरत?
याचिका में हाल के वर्षों में हुए उन राजनीतिक घटनाक्रमों का जिक्र किया गया है जहाँ जनप्रतिनिधियों ने 10वीं अनुसूची के ‘विलय प्रावधान’ का सहारा लेकर अपनी निष्ठाएं बदल लीं. इसमें आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) जैसी पार्टियों के जनप्रतिनिधियों के अन्य राजनीतिक दलों में शामिल होने के उदाहरणों की ओर इशारा किया गया है.
क्या कहता है संविधान का दल-बदल कानून?
संविधान में 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 के जरिए 10वीं अनुसूची जोड़ी गई थी, जिसका मुख्य मकसद विधायकों और सांसदों द्वारा किए जाने वाले ‘आया राम, गया राम’ यानी अलोकतांत्रिक दल-बदल को रोकना था. हालांकि, इसका पैराग्राफ 4 यह छूट देता है कि यदि किसी राजनीतिक दल के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करते हैं, तो उन पर अयोग्यता (Disqualification) लागू नहीं होगी. अब सिब्बल की इस याचिका ने इसी कानूनी ढाल पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है.
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