छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बुजुर्ग माता-पिता के स्वाभिमान और उनके शांतिपूर्ण जीवन को लेकर एक बेहद भावुक और कड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जो बच्चे अपने माता-पिता को जीवन के आखिरी पड़ाव में मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना देंगे, उन्हें उनके ही घर से बेदखल कर दिया जाएगा.
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने बिलासपुर के एक मामले में बेटे-बहू की याचिका को खारिज करते हुए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल के बेदखली के आदेश को सही ठहराया है.
सिर्फ रोटी-कपड़ा नहीं, सम्मान से जीना भी भरण-पोषण
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाई कोर्ट ने ‘वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007’ की बेहद मानवीय व्याख्या की. कोर्ट ने कहा:
“भरण-पोषण का मतलब सिर्फ भोजन, कपड़ा या पैसा दे देना नहीं है. इसका असली अर्थ बुजुर्गों को गरिमा, शांति और मानसिक सुकून के साथ जीने का माहौल देना है.”
अदालत ने साफ किया कि अगर कोई बुजुर्ग आर्थिक रूप से सक्षम भी है, तब भी उसे सम्मान से जीने का पूरा अधिकार है और प्रताड़ना की स्थिति में कानून उन्हें पूरा संरक्षण देगा.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला मुंगेली रोड, बिलासपुर की मिनोचा कॉलोनी का है. यहाँ रहने वाली 93 वर्षीय बुजुर्ग मां संतोष खन्ना ने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (SDO कोर्ट) में गुहार लगाई थी कि उनके मकान की पहली मंजिल पर रहने वाले उनके अपने बड़े बेटे देवेंद्र खन्ना और बहू नीरजा खन्ना उन्हें लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं. उम्र के इस पड़ाव पर आकर मां को अपने ही बच्चों से जान का खतरा महसूस होने लगा था, जिसके बाद उन्होंने बेदखली की मांग की थी.
अदालत ने सिखाया कर्तव्य का पाठ
ट्रिब्यूनल ने दस्तावेजों और मां की शिकायत के आधार पर 12 सितंबर 2024 को बेटे-बहू को घर खाली करने का आदेश दिया था. इसके बाद बेटे-बहू ने कलेक्टर (अपीलीय ट्रिब्यूनल) और फिर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन हर जगह उनकी दलीलें खारिज हो गईं.
हाई कोर्ट ने साफ किया कि यह आदेश किसी मालिकाना हक का फैसला नहीं, बल्कि एक लाचार और बुजुर्ग मां को उसकी जिंदगी के आखिरी दिनों में सुरक्षा और शांति देने का प्रयास है.
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