चक्रधरपुर. “तुम डाल-डाल तो हम पात-पात”—यह कहावत इन दिनों दक्षिण पूर्व रेलवे जोन के चक्रधरपुर रेलमंडल में रेल अधिकारियों के बीच चल रहे प्रशासनिक खींचतान पर सटीक बैठती नजर आ रही है. रेलमंडल में तबादला और पदस्थापना को लेकर उपजा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है, बल्कि हर नए आदेश के साथ और गहराता जा रहा है.
मिली जानकारी के अनुसार, 15 दिसंबर को रेलमंडल के सीनियर डीईई (ओपी) द्वारा 115 संटर को ट्रेन चालक (लोको पायलट) के पद पर पदोन्नति दी गई थी. लेकिन पदोन्नति के बाद इन चालकों की पोस्टिंग को लेकर कई तरह की अनियमितताएं सामने आईं. मामले की गंभीरता को देखते हुए डीआरएम चक्रधरपुर तरुण हुरिया ने हस्तक्षेप करते हुए उक्त आदेश पर रोक लगाई और सभी पदोन्नत ट्रेन चालकों को नियमित रूप से नए स्थानों पर योगदान देने का निर्देश जारी किया.
हालांकि इसके बाद प्रशासनिक स्तर पर एक नया मोड़ सामने आया है. जिसके तहद सीनियर डीईई (ओपी) ने एक नई रणनीति के तहत डीआरएम के इस महत्वपूर्ण आदेश को ही पलटते हुए कुछ चयनित पदोन्नत लोको पायलटों को म्यूचुअल ट्रांसफर (अंतःविभागीय स्थानांतरण) के नाम पर पुनः उन्हीं स्थानों पर पदस्थापित कर दिया, जहां से उन्हें कुछ दिन पहले डीआरएम के निर्देश पर हटाया गया था.
हैरानी की बात यह है कि जिन ट्रेन चालकों का म्यूचुअल ट्रांसफर किया गया है, उन्होंने डीआरएम द्वारा तय नई स्थान पर महज एक दिन ही ड्यूटी की है. एक दिन की औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराने के बाद उन्होंने लोको पायलट पद पर अपना इफेक्ट करवाया और पुनः पुराने स्थान पर लौटकर वहीं रिलीविंग ड्यूटी करते रहे. इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पदोन्नति के बाद डीआरएम द्वारा भेजे गए नए स्थान पर इन ट्रेन चालकों ने अपने नए कार्यस्थल पर अब तक एलआर भी पूरा नहीं किया था, इसके बावजूद उनका म्यूचुअल ट्रांसफर स्वीकृत कर दिया गया है.
इस पूरी प्रक्रिया को लेकर रेल कर्मचारियों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी जल्दबाजी में सीनियर डीईई (ओपी) ने इन म्यूचुअल ट्रांसफरों पर किस कारण अपनी मोहर लगाई. इसके साथ ही डीआरएम के निर्देशों का महत्व भी कटघरे में खड़ा होता नजर आ रहा है. वहीं यह सवाल भी उठ रहा है कि सीनियर डीपीओ, जो सामान्यतः ट्रांसफर-पोस्टिंग की सूची जारी करते हैं, इस पूरे मामले में अब तक उनकी उपस्थिति कन्हीं नजर नहीं आई.
ट्रांसफर और पुनः पोस्टिंग के इस फैसले से रेलमंडल में कर्मचारियों और यूनियनों के बीच नाराजगी साफ तौर पर देखी जा रही है. कई कर्मचारियों का कहना है कि इस तरह के निर्णयों से रेल संचालन और सुरक्षा दिशानिर्देशों के महत्व पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगते हैं. कुछ सामाजिक और कर्मचारी संगठनों ने इसे भ्रष्टाचार और पक्षपात की नई मिसाल बताते हुए विभाग में बढ़ते असंतोष की ओर इशारा किया है.
रेल कर्मचारियों और संचालन से जुड़े एक वर्ग का स्पष्ट कहना है कि सुरक्षा और निर्धारित गाइडलाइन के तहत तबादला और पदस्थापना की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए, न कि आपसी समझौते या कुछ अधिकारियों की प्राथमिकताओं के आधार पर. अब सभी की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि, डीआरएम और सीनियर डीईई (ओपी) के बीच चल रहे इस प्रशासनिक विवाद पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है और क्या रेलवे प्रशासन इस पूरे मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया देकर स्थिति को स्पष्ट करता है या नहीं.

