- 20,000 स्थानों पर ‘टैंक टू टैप’ (टैंक से नल तक) वाटर फिल्ट्रेशन सिस्टम स्थापित किए जाएंगे
NEW DELHI. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा ऑडिट रिपोर्ट ने भारतीय रेल के दावों और उसकी धरातली हकीकत के बीच एक चिंताजनक खाई को उजागर कर दिया है. संसद के पटल पर रखी गई इस जांच रिपोर्ट के बाद यह सवाल गंभीर हो गया है कि करोड़ों यात्रियों को मंजिल तक पहुंचाने वाली जीवनरेखा कहीं जनस्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा तो नहीं बनती जा रही?
पीने के पानी में खतरनाक बैक्टीरिया का मिलना
कैग द्वारा देश भर के 512 रेलवे स्टेशनों का गहन विश्लेषण किया गया, जिसके नतीजे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद खतरनाक संकेत देते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, 6 जोनों के लगभग 59 स्टेशनों पर पीने के पानी की अनिवार्य जीवाणु जांच तक नहीं कराई गई. इससे भी अधिक गंभीर बात यह सामने आई कि कई प्रमुख स्टेशनों के वाटर कूलरों से लिए गए जल नमूनों में ‘ई-कोली’ (E. Coli) जैसे संक्रामक बैक्टीरिया पाए गए.
चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, जल में ई-कोली की मौजूदगी गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण, डायरिया और अन्य जलजनित बीमारियों का कारण बन सकती है. यह स्थिति सीधे तौर पर यात्रियों के स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षा के अधिकार पर सवाल खड़े करती है.
स्वच्छता मानकों में भारी अनदेखी
रिपोर्ट में केवल पेयजल ही नहीं, बल्कि स्टेशनों पर नागरिक सुविधाओं की बदहाली का भी ब्योरा दर्ज है:
- शौचालय व स्वच्छता: छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस, हावड़ा, सियालदह और नई दिल्ली जैसे व्यस्ततम केंद्रों पर शौचालयों एवं मूत्रालयों में गंदगी और रखरखाव का अभाव पाया गया.
- यात्री सुविधाएं: बैठने की उचित व्यवस्था, पंखों की स्थिति, कचरा निष्पादन और इलेक्ट्रॉनिक सूचना बोर्डों के संचालन में मानकों का पालन नहीं पाया गया.
सुधारात्मक कदम और विधिक पहलू
ऑडिट निष्कर्षों के सार्वजनिक होने के बाद रेल मंत्रालय ने मामले की समीक्षा करते हुए वॉटर प्यूरीफायर लगाने, पानी की टंकियों को बदलने और गुणवत्ता की नियमित जांच के निर्देश जारी किए हैं. रेलवे प्रशासन ने फैसला किया है कि स्टेशनों पर यात्रियों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए लगभग 20,000 स्थानों पर ‘टैंक टू टैप’ (टैंक से नल तक) वाटर फिल्ट्रेशन सिस्टम स्थापित किए जाएंगे. इसके तहत स्टेशनों पर मौजूद सभी वाटर कूलरों और सार्वजनिक नलों में नई और उन्नत वाटर प्यूरीफिकेशन प्रणाली जोड़ी जाएगी ताकि बैक्टीरिया और अन्य अशुद्धियों को खत्म किया जा सके.
हालांकि, प्रशासनिक और कानूनी जानकारों का मानना है कि रेलवे बोर्ड द्वारा यात्री सेवाओं के लिए निर्धारित वैधानिक दिशा-निर्देशों का क्षेत्रीय स्तर पर अनुपालन न होना एक गंभीर जवाबदेही का विषय है. यदि उपभोक्ता अधिकारों और लोक स्वास्थ्य सुरक्षा के नजरिए से देखा जाए, तो सेवा प्रदान करने में यह ढिलाई यात्रियों के प्रति कानूनी दायित्वों की विफलता की ओर इशारा करती है. जब तक निगरानी तंत्र को जवाबदेह नहीं बनाया जाता, तब तक सुधारात्मक आदेश केवल कागजी साबित हो सकते हैं.


