पटना. बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बहाली नियमावली 2026 को लेकर चल रहा गतिरोध आखिरकार टूट गया है. पिछले 21 दिनों से गर्दनीबाग में अनशन पर बैठे शोध छात्रों और पीएचडी धारकों के आंदोलन के आगे राजभवन और शिक्षा विभाग को रुख बदलना पड़ा है. हालांकि, राज्यपाल के साथ हुई बैठक में मानी गई मांगों ने राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था और भावी प्रोफेसरों के चयन मानक पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है.
उम्र सीमा में बड़ी छूट, 55 वर्ष के अभ्यर्थी भी दौड़ में
नये संशोधन के तहत अब असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति के लिए अधिकतम उम्र सीमा को 43 वर्ष से बढ़ाकर सीधे 55 वर्ष करने का फैसला लिया गया है. भले ही इसे अतिथि/संविदा प्रोफेसरों के समायोजन और उम्रदराज अभ्यर्थियों के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा हो, लेकिन शिक्षाविदों का एक वर्ग सवाल उठा रहा है कि क्या 55 वर्ष की उम्र में नियमित नियुक्ति से उच्च शिक्षा में नई ऊर्जा और नए शोध संस्कृति का संचार हो पाएगा?
ऑब्जेक्टिव परीक्षा और इंटरव्यू में टीचिंग डेमो का नया मॉडल
पारदर्शिता लाने के नाम पर अब लिखित परीक्षा में वस्तुनिष्ठ (ऑब्जेक्टिव) सवाल पूछे जाने और इंटरव्यू में ‘टीचिंग डेमो’ शामिल करने का प्रस्ताव है.
- ऑब्जेक्टिव प्रश्न: बहुविकल्पीय प्रश्नों से मूल्यांकन प्रक्रिया में निष्पक्षता का दावा किया जा रहा है, ताकि मनमाने अंक देने के आरोपों पर लगाम लगे.
- टीचिंग डेमो: साक्षात्कार के समय अभ्यर्थियों को क्लासरूम टीचिंग का प्रदर्शन करना होगा, जिससे उनके पढ़ाने के कौशल का सीधा आकलन होगा.
API स्कोर और PhD के भारांक पर खींचतान
समझौते के बाद बनाई जाने वाली 15-दिवसीय समिति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती एपीआई (API) स्कोर के असंतुलन को ठीक करना है.
- पीएचडी को झटका: पुराने नियमों में पीएचडी के लिए 30 अंक का बड़ा प्रावधान था, जिसे घटाने पर सहमति बनी है. शोध छात्रों का तर्क है कि इससे वर्षों की मेहनत का मोल कम हो जाएगा.
- NET-JRF को राहत: नेट और जेआरएफ अभ्यर्थियों के लिए अधिकतम 11 अंक तय करने की मांग पर विचार किया जा रहा है.
- गेस्ट फैकल्टी का पेंच: अतिथि शिक्षकों को उनके कार्य अनुभव का लाभ देने और मानदेय बढ़ाने की मांग भी समिति के पाले में है.
बड़ा सवाल… सुधार या केवल समझौता?
राजभवन में हुई इस वार्ता से फिलहाल आंदोलन तो स्थगित हो गया है, लेकिन सवाल वही है कि क्या हर बार नीतिगत बदलावों के लिए छात्रों को सड़कों पर उतरना पड़ेगा? 15 दिनों में गठित समिति का निर्णय ही यह तय करेगा कि बिहार के विश्वविद्यालयों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षक मिलेंगे या यह सिर्फ राजनीतिक संतुलन साधने का एक जरिया बनकर रह जाएगा.





