नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट में एक पारिवारिक विवाद (Matrimonial Dispute) की सुनवाई के दौरान उस समय वकीलों और जजों के बीच हल्के-फुल्के लेकिन तीखे संवाद देखने को मिले, जब सुनवाई के दौरान ‘पॉकेट मनी’ और डॉलर में खर्चों का मुद्दा उठ गया। मामला न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ के सामने चल रहा था, जहां सुनवाई के दौरान एक ऐसा वाकया सामने आया जिसने कोर्ट रूम में मौजूद सभी लोगों का ध्यान खींच लिया।
क्या था पूरा मामला?
अदालत में एक वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान पत्नी पक्ष की ओर से पति से मिल रहे अन्य भरण-पोषण और खर्चों के अलावा 1,500 अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त ‘पॉकेट मनी’ की मांग रखी गई। इस अजीबोगरीब मांग को सुनकर बेंच के जज साहब भी हैरान रह गए और उन्होंने इस पर बेहद दिलचस्प और व्यंग्यात्मक टिप्पणी की।
जज ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पति को पहले से ही सारे घरेलू और अन्य खर्चे उठाने पड़ रहे हैं, और उसके ऊपर से इस तरह की पॉकेट मनी की मांग भी की जाने लगे, तो यह एक बेहद खतरनाक और असहज स्थिति पैदा कर देगा।
जज साहब ने खुद का उदाहरण देकर खींचा ध्यान
इस मामले पर अपनी बात रखते हुए बेंच के जज ने मजाकिया लहजे में अपने वेतन का जिक्र छेड़ दिया। उन्होंने कहा, “हमारी तो महीने की सैलरी ही महज 3 लाख रुपये है, कोई 15,000 डॉलर महीने की नहीं है।” इसके साथ ही उन्होंने कोर्ट रूम में मौजूद महिला वकील को हिदायत देते हुए कहा कि “यहां मौजूद महिलाओं को ऐसे शानदार और महंगे आइडिया बिल्कुल मत दीजिए।”
जज ने तंज कसते हुए यह भी कहा कि अगर इस तरह की डिमांड्स को कानूनी रूप से बढ़ावा मिलने लगा, तो कल को देश की बाकी पत्नियां भी अपने पतियों से अलग से ‘पॉकेट मनी’ की मांग करने लगेंगी। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से संकेत दिया कि भरण-पोषण के नाम पर अवास्तविक और अत्यधिक वित्तीय मांगें उचित नहीं ठहराई जा सकतीं।
पारिवारिक मामलों पर अदालत की पैनी नजर
यह मामला इस बात का एक उदाहरण है कि कैसे देश की शीर्ष अदालतें वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण से जुड़े मामलों में व्यावहारिक और तार्किक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर देती हैं। जहां एक तरफ कानून महिलाओं और पतियों के बीच वित्तीय संतुलन बनाए रखने के लिए नियमों का पालन करता है, वहीं दूसरी ओर इस तरह की हास्यप्रद और तीखी टिप्पणियां न्याय प्रक्रिया में मानवीय पक्षों और जीवन की वास्तविक सच्चाइयों को भी उजागर करती हैं।
इस घटना के बाद से ही सुप्रीम कोर्ट की यह दिलचस्प टिप्पणी सोशल मीडिया और कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है, जहाँ लोग इस पर अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।


