नई दिल्ली: देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने और जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए नए नियमों पर विवाद अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि वह ‘यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) रेगुलेशंस, 2026’ की व्यापक समीक्षा के लिए एक विशेष समिति के गठन पर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार का यह कदम देश भर के परिसरों में पनप रहे असंतोष और कानूनी खींचतान को शांत करने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई और सरकार का रुख
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया कि सरकार इस मामले की गहराई से जांच कर रही है। उन्होंने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य छात्रों की सभी चिंताओं का पूरी तरह से समाधान करना है, ताकि किसी भी वर्ग का कोई भी छात्र या पक्ष खुद को असंतुष्ट या आशंकित महसूस न करे। अदालत ने सभी पक्षों के हितों की रक्षा की आवश्यकता पर जोर देते हुए इस मामले की सुनवाई को आगामी चार सप्ताह के लिए टाल दिया है।
क्या है पूरा विवाद और क्यों अटके हैं नियम?
यह पूरा कानूनी मामला वर्ष 2019 में रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं द्वारा दायर की गई याचिकाओं से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने परिसरों में कथित तौर पर जातिगत भेदभाव का सामना करने के बाद आत्महत्या कर ली थी। इन त्रासदियों के बाद उच्च शिक्षा संस्थानों में मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग उठी थी, जिसके बाद यूजीसी ने विचार-विमर्श के बाद इस साल जनवरी में 2026 के नए नियमों को अधिसूचित किया था, जिसने 2012 के पुराने ढांचे की जगह ली थी।
हालांकि, जनवरी 2026 में ही सुप्रीम कोर्ट ने इन नए नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी थी। अदालत ने शुरुआती टिप्पणियों में कहा था कि इन नियमों के कई प्रावधान पहली नजर में काफी अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की पूरी आशंका है। अदालत ने निर्देश दिया था कि जब तक नए और स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार नहीं हो जाते, तब तक पुराने 2012 के नियम ही प्रभावी रहेंगे।
नियमों की परिभाषा और विरोध की मुख्य वजहें
इस विवाद के केंद्र में मुख्य रूप से नियम 3(1)(c) के तहत ‘जाति-आधारित भेदभाव’ की वह परिभाषा है, जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के सदस्यों के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार पर केंद्रित है। दूसरी ओर, सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के याचिकाकर्ताओं और छात्र संगठनों का तर्क है कि यह फ्रेमवर्क एकतरफा और भेदभावपूर्ण है, जिससे आरक्षित श्रेणी में न आने वाले छात्रों के अधिकारों और हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
हाल ही में इस मुद्दे पर वैचारिक संगठनों और अकादमिक जगत की ओर से भी चिंताएं जताई गई हैं, जिसके बाद सरकार ने अगस्त में ही कोर्ट को बता दिया था कि इन नियमों पर पुनर्विचार किया जा रहा है। अब समिति के गठन की प्रक्रिया शुरू होने से उम्मीद जताई जा रही है कि परिसरों में सामाजिक सौहार्द और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए एक संतुलित और सर्वमान्य समाधान निकाला जा सकेगा।


