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Home » पटना हाईकोर्ट का तलाक पर फैसला: जीवनसाथी को ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देखना अवैध संबंध का आधार नहीं
बिहार

पटना हाईकोर्ट का तलाक पर फैसला: जीवनसाथी को ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देखना अवैध संबंध का आधार नहीं

Ocean News DeskBy Ocean News DeskSeptember 15, 2026
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पटना. पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी जीवनसाथी को अन्य व्यक्ति के साथ केवल ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में देख लेना कानूनी तौर पर अवैध संबंध यानी व्यभिचार या शारीरिक संबंध की पुष्टि नहीं करता है. अदालत ने कहा कि ‘आपत्तिजनक स्थिति’ और ‘शारीरिक संबंध’ दोनों के कानूनी अर्थ और मानक बिल्कुल अलग हैं. इस कानूनी टिप्पणी के साथ खंडपीठ ने पति द्वारा दायर तलाक की याचिका को खारिज कर दिया और निचली अदालत के निर्णय को पूरी तरह से बरकरार रखा है.

मुकदमे की पृष्ठभूमि और पारिवारिक विवाद

समस्तीपुर के रहने वाले एक युवक का विवाह 2 जुलाई 2006 को मधुबनी की युवती के साथ संपन्न हुआ था. वर्ष 2010 में दंपति को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद पारिवारिक कलह बढ़ने लगी. पति का मुख्य आरोप यह था कि उसकी पत्नी का संबंध अपनी बड़ी बहन के पति यानी जीजा के साथ था और उसने दोनों को एक बार आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था.

पति के अनुसार जब उसने इसका विरोध किया तो पत्नी ने उसके साथ क्रूरता करनी शुरू कर दी और 30 मार्च 2013 को घर छोड़कर अपने पिता के साथ चली गई. इन्ही आधारों पर पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) और 13(1)(ia) के अंतर्गत मधुबनी फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दी थी, जिसे 4 अप्रैल 2024 को खारिज कर दिया गया था. इसी फैसले के खिलाफ पति ने पटना हाईकोर्ट में अपील दायर की थी.

हाईकोर्ट की खंडपीठ के पांच प्रमुख बिंदु

माननीय न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए पांच महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को रेखांकित किया:

  1. हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i) के तहत यह साबित करना आवश्यक है कि विवाह के पश्चात किसी अन्य व्यक्ति के साथ वास्तविक शारीरिक संबंध स्थापित हुआ है, जिसे याचिकाकर्ता पति साबित करने में पूरी तरह असफल रहा.

  2. चश्मदीद होने का दावा करने के बावजूद पति द्वारा इस मामले में पुलिस के समक्ष कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी, और न ही परिवार के किसी अन्य सदस्य ने इसका समर्थन किया.

  3. व्यभिचार या अवैध संबंध जैसे गंभीर आरोपों को केवल संभावनाओं या मौखिक बयानों के आधार पर नहीं माना जा सकता, इसके लिए मजबूत और ठोस परिस्थितिजन्य साक्ष्य जरूरी हैं.

  4. वैवाहिक विवादों के अन्य आधारों का फैसला संभावनाओं के आधार पर हो सकता है, लेकिन अवैध संबंध के आरोपों को कानूनी रूप से ‘संदेह से परे’ साबित करना अनिवार्य होता है.

  5. चूंकि पति का क्रूरता का पूरा मामला कथित अवैध संबंध के इर्द-गिर्द घूमता था और मुख्य आरोप ही सिद्ध नहीं हो सका, इसलिए क्रूरता के इस तर्क को भी अदालत ने निराधार मान लिया.

अवैध संबंध साबित करने के चार कानूनी मानक

अपने निर्णय में अदालत ने ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि अवैध संबंध को प्रमाणित करने के लिए मुख्य रूप से चार प्रकार के साक्ष्यों की आवश्यकता होती है. इनमें परिस्थितिजन्य साक्ष्य, बिना शारीरिक संबंध के बच्चे का जन्म, संक्रामक यौन रोग की स्थिति, या फिर आरोपी पक्ष की स्पष्ट स्वीकारोक्ति शामिल है. केवल अनुमानों के आधार पर वैवाहिक बंधन को समाप्त नहीं किया जा सकता है.

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