- पूर्वी सिंहभूम जिले के एक गांव से जुड़ा है मामला, 27 दिसंबर 1999 की देर रात की घटना
रांची/जमशेदपुर. झारखंड उच्च न्यायालय ने 27 साल पुराने एक आपराधिक मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कानून के ‘अपराध की मंशा’ (Mens Rea) और ‘प्रत्यक्ष कृत्य’ (Overt Act) के मूलभूत सिद्धांत को रेखांकित किया है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी महिला के घर में आधी रात को अनधिकृत प्रवेश करना और अनुचित व्यवहार करना बेहद गंभीर अपराध है, लेकिन जब तक दुष्कर्म के इरादे को साबित करने वाला कोई तात्कालिक व प्रत्यक्ष कृत्य सामने न आए, तब तक इसे ‘रेप का प्रयास’ (IPC धारा 376/511) नहीं माना जा सकता.
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी की चार साल की सश्रम कारावास की सजा को रद्द कर दिया, हालांकि अदालत ने आरोपी के इस कृत्य को महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से किया गया हमला माना और उसे IPC की धारा 354 का दोषी ठहराया.
कानूनी अंतर: तैयारी, मंशा और प्रयास
उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी पहली नज़र में संवेदनशील लग सकती है, लेकिन आपराधिक न्यायशास्त्र के नज़रिए से यह कानून का सख्त संतुलन प्रस्तुत करती है. भारतीय आपराधिक कानून में किसी अपराध के चार चरण होते हैं, मंशा, तैयारी, प्रयास और अपराध की पूर्णता.
- तैयारी और प्रयास में अंतर : कानून के अनुसार, केवल घर में घुसना या अश्लील हरकत करना ‘तैयारी’ या ‘लज्जा भंग’ (धारा 354) के दायरे में आ सकता है.
- प्रत्यक्ष कृत्य की आवश्यकता : धारा 376/511 (रेप का प्रयास) के लिए यह अनिवार्य है कि आरोपी ने अपराध को अंजाम देने की दिशा में ऐसा अंतिम व सीधा कदम उठाया हो, जिससे अपराध का होना लगभग तय था.
पीड़िता की गवाही का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के बाद अदालत ने पाया कि आरोपी का आचरण निस्संदेह आपराधिक व अश्लील था, लेकिन धारा 376/511 के तहत कानूनी कसौटी पर यह ‘अंतिम प्रयास’ के रूप में सिद्ध नहीं होता.
न्याय की संतुलनकारी व्यवस्था
न्यायालय ने आरोपी को पूरी तरह बरी नहीं किया है, बल्कि अपराध को उसके सही कानूनी ढांचे के तहत श्रेणीबद्ध किया है. यदि अदालत बिना पर्याप्त प्रत्यक्ष साक्ष्यों के किसी को ‘प्रयास’ का दोषी मानती, तो वह आपराधिक साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) के सिद्धांतों के विपरीत होता.
यह मामला पूर्वी सिंहभूम जिले के एक गांव से जुड़ा है, जो 27 दिसंबर 1999 की देर रात का है. हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश साफ किया है कि अदालती न्याय केवल जनभावनाओं पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों की कठोर कानूनी परिभाषा और धाराओं के सही अनुप्रयोग पर आधारित होता है.



