रांची. देवघर अदालत से जुड़े एक अवमानना मामले में रांची उच्च न्यायालय का हालिया फैसला केवल एक अदालती राहत नहीं है, बल्कि यह एक निष्पक्ष पत्रकार की मरणोपरांत नैतिक और साख की बड़ी जीत है. पत्रकार रवि प्रकाश भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से जूझते हुए भी अपनी निष्ठा और साख को बेदाग देखने की उनकी तड़प इस फैसले से पूरी हुई है. यह मामला उस समय का हे जब रवि प्रकाश देवघर प्रभात खबर के संपादक हुआ करते थे.
अंतिम दिनों की वह इच्छा, “यह कलंक मिटना आवश्यक है”
रवि प्रकाश के मित्र और वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्रा की सोशल मीडिया पोस्ट इस लड़ाई के पीछे के दर्द और सत्यनिष्ठा को उजागर करती है. अपने मित्र को याद करते हुए उन्होंने लिखा कि रवि प्रकाश जब कैंसर से जिंदगी की अंतिम जंग लड़ रहे थे और उन्हें पता था कि मृत्यु किसी भी क्षण आ सकती है, तब भी उनके मन में सबसे बड़ी चिंता अपनी निष्पक्षता पर लगे कथित दाग को हटाने की थी.

निधन से महज 15 दिन पहले मोबाइल पर हुई बातचीत में रवि ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा था, “यह कलंक लग गया है, इसका मिटना आवश्यक है.” आज जब रांची उच्च न्यायालय ने उस अवमानना वाद को समाप्त कर दिया, तो संजय मिश्रा ने भावुक होकर लिखा कि भले ही रवि अब अपनी देह से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन उनके और उनके साथियों के लिए यह कलंक मिटना एक बहुत बड़ी जीत है.
पत्रकारिता के नाम पर निजी स्वार्थ साधने वाले और सत्ता के गलियारों में चाटुकारिता कर ऊंचे ओहदों पर बैठे लोग अक्सर सोशल मीडिया पर निष्पक्षता का ज्ञान बांटते नजर आते हैं. जबकि सच यह है कि वे खुद नैतिक गिरावट की कालिमा में डूबे हुए हैं. जब-जब कोई निष्पक्ष पत्रकार व्यवस्था की खामियों से लड़ता है, तब-तब यही अवसरवादी वर्ग स्क्रीन और सोशल मीडिया पर घड़ियाली आंसू बहाकर सहानुभूति बटोरने का काम करता है.
निष्पक्षता की तड़प बनाम न्यूज रूम्स का दोहरापन
रवि प्रकाश की यह कानूनी विजय आज के मीडिया तंत्र के दोहरे चरित्र पर भी कड़ा प्रहार करती है. एक तरफ जहां एक सच्चा पत्रकार अपने अंतिम क्षणों में भी केवल अपनी व्यावसायिक निष्ठा और बेदाग छवि के लिए चिंतित था, वहीं दूसरी तरफ खबरों की दुनिया में ‘दलाली’ और ‘चापलूसी’ का बोलबाला बढ़ता जा रहा है.
पत्रकारिता के नाम पर निजी स्वार्थ साधने वाले और सत्ता के गलियारों में चाटुकारिता कर ऊंचे ओहदों पर बैठे लोग अक्सर सोशल मीडिया पर निष्पक्षता का ज्ञान बांटते नजर आते हैं. जबकि सच यह है कि वे खुद नैतिक गिरावट की कालिमा में डूबे हुए हैं. जब-जब कोई निष्पक्ष पत्रकार व्यवस्था की खामियों से लड़ता है, तब-तब यही अवसरवादी वर्ग स्क्रीन और सोशल मीडिया पर घड़ियाली आंसू बहाकर सहानुभूति बटोरने का काम करता है.
सच्ची श्रद्धांजलि और साख की विजय
रवि प्रकाश और उनके साथी संजीत मंडल की यह कानूनी जीत यह साबित करती है कि निष्पक्ष आवाजों को प्रशासनिक या कानूनी मुकदमों के जरिए कुछ समय के लिए परेशान तो किया जा सकता है, लेकिन उनकी सच्चाई को मिटाया नहीं जा सकता.
संजय मिश्रा की पोस्ट के शब्द “एक बार फिर जीत गए रवि… आपको बधाई देने का मन कर रहा है” उन तमाम निष्पक्ष और संघर्षशील पत्रकारों की भावना को दर्शाते हैं जो आज भी संसाधनों के अभाव और दबावों के बावजूद अपनी कलम का सौदा नहीं करते.
रवि प्रकाश हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यह न्यायिक विजय आज के चाटुकार मीडिया तंत्र के मुंह पर एक करारा जवाब है कि पत्रकारिता का असली मोल पदों में नहीं, बल्कि कलम की निष्ठा और सच्चाई में है.
रवि प्रकाश को विनम्र श्रद्धांजलि




