आपूर्ति पर्याप्त होने के बावजूद खुदरा दरों का उच्च स्तर पर बना रहना यह दर्शाता है कि आपूर्ति श्रृंखला के अंतिम छोर पर निगरानी तंत्र कमजोर है. केवल मिल दरों को नियंत्रित करना या आयात की समय-सीमा बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, जब तक स्थानीय स्तर पर वितरण प्रणाली और व्यापारियों के मार्जिन को पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक उपभोक्ताओं को राहत मिलना मुश्किल है.
नई दिल्ली. देश भर में चीनी की कीमतों में आई अचानक तेजी ने आम जनता के बजट को प्रभावित करना शुरू कर दिया है. खुदरा और थोक बाजारों में कीमतों की उछाल से आम आदमी की रसोई पर सीधा असर दिख रहा है, जिससे त्योहारों और दैनिक उपभोग के मौकों पर मिठास पर कड़वाहट का साया मंडराने लगा है.
हालिया दिनों में चीनी के खुदरा भाव लगभग 64 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुके हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह 76 रुपये प्रति किलो तक की रिकॉर्ड दर पर भी बिक रही है. थोक दरों में बढ़ोतरी के कारण औसत खुदरा मूल्यों में पिछले एक महीने के भीतर 31 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है.
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हालांकि, पिछले कुछ दिनों में मिलों से निकलने वाली एक्स-मिल दरों में गिरावट आई है, लेकिन इस गिरावट का लाभ अभी तक अंतिम उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंच पाया है. थोक और खुदरा स्तर के बीच का यह अंतर मूल्य नियंत्रण तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है.
मांग-आपूर्ति का गणित और सरकारी पक्ष
खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, देश में चीनी की आपूर्ति और उत्पादन का संतुलन फिलहाल स्थिर है:
- कुल उत्पादन अनुमान: विपणन वर्ष 2025-26 के लिए चीनी का उत्पादन (एथेनॉल निर्माण के लिए आवंटन के बाद) लगभग 279 लाख टन रहने की उम्मीद है.
- उपलब्ध स्टॉक: शुरुआती स्टॉक 50 लाख टन के साथ कुल उपलब्धता घरेलू वार्षिक मांग (280-285 लाख टन) को पूरा करने के लिए पर्याप्त मानी जा रही है.
- एक्स-मिल दरें: सरकारी हस्तक्षेप और आयात नीति में ढील के बाद मिल स्तर पर दरें घटकर 55 रुपये प्रति किलोग्राम तक आ चुकी हैं.
इसके बावजूद खुदरा स्तर पर कीमतों का ऊंचा बना रहना बाजार में सट्टेबाजी, मुनाफाखोरी और जमाखोरी की ओर इशारा करता है.
नीतिगत कदम और चुनौतियां
बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है. ब्राजील जैसे देशों के बंदरगाहों पर भीड़भाड़ और माल ढुलाई में लगने वाले समय को देखते हुए विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने आयातित चीनी के प्रसंस्करण और घरेलू बिक्री की समय-सीमा को भी आसान बनाया है. इसके अलावा, जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए राज्यों में जांच दस्तों को सक्रिय किया गया है.
आपूर्ति पर्याप्त होने के बावजूद खुदरा दरों का उच्च स्तर पर बना रहना यह दर्शाता है कि आपूर्ति श्रृंखला के अंतिम छोर पर निगरानी तंत्र कमजोर है. केवल मिल दरों को नियंत्रित करना या आयात की समय-सीमा बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, जब तक स्थानीय स्तर पर वितरण प्रणाली और व्यापारियों के मार्जिन को पारदर्शी नहीं बनाया जाता, तब तक उपभोक्ताओं को राहत मिलना मुश्किल है. आने वाले दिनों में यदि नीतियां धरातल पर तेजी से लागू नहीं हुईं, तो बाजार से मिठास का गायब होना तय है.
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