नई दिल्ली. पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद मतदाता सूची से बाहर किए गए लाखों वोटरों के भविष्य को लेकर असमंजस और चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं. इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में निर्वाचन आयोग (ECI) को कड़ा निर्देश देते हुए मतदाता सूची से संबंधित अपीलों का पूरा और विस्तृत डेटा पेश करने को कहा है. शीर्ष अदालत के इस दखल ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सूची से बाहर किए गए वैध मतदाताओं का क्या होगा और क्या उन्हें आगामी चुनावों से पहले मताधिकार मिल पाएगा.
सुप्रीम कोर्ट की एक विशेष पीठ समें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना शामिल हैं—ने सुनवाई के दौरान इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष लंबित मामलों की कोई स्पष्ट और पारदर्शी तस्वीर सामने नहीं आ रही है. कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इन अपीलों का एक निश्चित और तय समय-सीमा के भीतर निपटारा होना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी पात्र नागरिक को उसके लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित न होना पड़े.
याचिकाकर्ताओं की चिंताएं और ट्रिब्यूनल की स्थिति
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने गंभीर चिंताएं जाहिर कीं. उनका तर्क था कि पंचायत और नगरपालिका चुनाव बेहद करीब हैं, लेकिन जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके हैं, वे वर्तमान स्थिति में वोट डालने से पूरी तरह वंचित हो जाएंगे. वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट को 31 विधानसभा सीटों से जुड़ा डेटा सौंपते हुए बताया कि जमीनी स्तर पर लोगों के पास यह जानकारी तक उपलब्ध नहीं है कि उनके द्वारा दायर की गई अपीलों पर क्या कार्रवाई हुई है.
वहीं, एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने आरटीआई के हवाले से चौंकाने वाला आंकड़ा सामने रखा, जिसमें दावा किया गया कि एसआईआर ट्रिब्यूनल के समक्ष दायर अपीलों में से बड़ी संख्या उन लोगों की तरफ से नहीं है जिन्हें वास्तव में सूची से बाहर किया गया था. इस खुलासे ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
चुनाव आयोग का पक्ष और अदालत का व्यापक दृष्टिकोण
चुनाव आयोग के वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि आयोग अपीलीय ट्रिब्यूनल के साथ मिलकर मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज और सुव्यवस्थित करने के लिए काम कर रहा है. गौरतलब है कि इससे पहले लगभग 60 लाख दावों और आपत्तियों के निस्तारण के लिए पश्चिम बंगाल के अलावा ओडिशा और झारखंड से करीब 700 न्यायिक अधिकारियों को तैनात किया गया था. कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर पूर्व न्यायाधीशों की अध्यक्षता में 19 विशेष ट्रिब्यूनल का भी गठन किया गया था ताकि इन मामलों का निष्पक्ष फैसला किया जा सके.
हालांकि, याचिकाएं सिर्फ 31 विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित थीं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र और चिंता को व्यापक बनाते हुए स्पष्ट किया कि अदालत का ध्यान केवल चुनिंदा क्षेत्रों पर नहीं बल्कि पूरे राज्य पर रहेगा. यदि जरूरत पड़ी, तो लंबित मामलों के तेजी से निपटारे के लिए और अधिक ट्रिब्यूनल का गठन किया जाएगा ताकि प्रशासनिक देरी के कारण किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन न हो.
अदालत ने चुनाव आयोग से यह भी पूछा है कि लंबित अपीलों को श्रेणियों में बांटकर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल की जाए, जिसमें यह साफ हो कि क्रॉस-अपीलें कितनी हैं और मतदाताओं द्वारा सीधे तौर पर कितनी आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं. अब सबकी निगाहें चुनाव आयोग के अगले जवाब और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्देश पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल के इन लाखों प्रभावित वोटरों का राजनीतिक और लोकतांत्रिक भविष्य क्या होगा.





