लखनऊ. स्कूलों में अनुशासन, एकरूपता और संस्थागत पहचान को सर्वोपरि रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई भी छात्र व्यक्तिगत आधार पर स्कूल के नियमों में बदलाव की मांग नहीं कर सकता. हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक नाबालिग छात्रा की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब (सिर ढकने वाला स्कार्फ) पहनने की अनुमति मांगी थी. अदालत ने साफ किया कि जब स्कूल के नियम बिना किसी भेदभाव के सभी छात्रों पर समान रूप से लागू होते हैं, तो उनका पालन करना अनिवार्य है.
क्या था पूरा मामला?
यह पूरा विवाद प्रयागराज के एक निजी सहायता प्राप्त स्कूल से जुड़ा हुआ है. याचिकाकर्ता छात्रा ने कक्षा 10 तक इसी स्कूल में पढ़ाई की थी और जब उसने कक्षा 11 में प्रवेश के लिए आवेदन किया, तो स्कूल प्रबंधन ने ड्रेस कोड का हवाला देते हुए उसे हिजाब पहनने से रोक दिया और इसी शर्त के साथ प्रवेश देने से इनकार कर दिया. इसके बाद छात्रा ने जिला मजिस्ट्रेट और जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई. कोई राहत न मिलने पर छात्रा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
याचिकाकर्ता के तर्क और अदालत की प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान छात्रा के वकीलों ने तर्क दिया कि स्कार्फ पहनना उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a)), गरिमा और धार्मिक आस्था का अभिन्न हिस्सा है. हालांकि, कोर्ट ने इन तर्कों को खारिज कर दिया. बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई भी धार्मिक ग्रंथ या पुख्ता दस्तावेज पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि स्कार्फ पहनना उसकी आस्था की कोई “अनिवार्य प्रथा” (Essential Religious Practice) है. इसके अलावा, अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद उन तस्वीरों का भी संज्ञान लिया जिनमें उसी समुदाय की अन्य छात्राएं बिना हिजाब के स्कूल यूनिफॉर्म में नजर आ रही थीं.
पहले की ढील को स्थायी अधिकार नहीं माना जा सकता
छात्रा का मुख्य तर्क यह था कि वह छठी कक्षा से ही बिना किसी रोक-टोक के स्कूल में स्कार्फ पहनती आ रही है, जिसके समर्थन में उसने पुरानी आईडी और तस्वीरें भी साझा कीं. इस पर अदालत ने बहुत स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि पूर्व कक्षाओं में यदि स्कूल प्रशासन ने इस पर आपत्ति नहीं जताई थी, तो इसका मतलब यह नहीं कि छात्रा को भविष्य के लिए कोई स्थायी छूट या कानूनी अधिकार मिल गया है. अदालत ने माना कि यह पूर्व की स्थिति संभवतः ढिलाई, शिष्टाचार या अनदेखी का परिणाम हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि स्कूल बाद में अपने नियमों को सख्ती से लागू नहीं कर सकता.
स्कूल यूनिफॉर्म के महत्व पर हाईकोर्ट का संदेश
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि यूनिफॉर्म का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच समानता बनाए रखना, अनुशासन स्थापित करना और स्कूल की एक साझा पहचान को मजबूत करना है. सभी धर्मों के छात्रों पर एक जैसा नियम लागू होने से शिक्षण संस्थानों में धर्म-निरपेक्ष माहौल बनाए रखने में मदद मिलती है. अदालत ने चेतावनी दी कि यदि व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर हर छात्र को यूनिफॉर्म में बदलाव करने की छूट दे दी जाए, तो ड्रेस कोड तय करने का मूल उद्देश्य ही पूरी तरह समाप्त हो जाएगा.





