चेन्नई/नई दिल्ली.
देशभर में आगामी परिसीमन (Delimitation) को लेकर जारी राजनीतिक सुगबुगाहट के बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने राज्य विधानसभा में एक विशेष प्रस्ताव पेश किया. इस प्रस्ताव में केंद्र सरकार से आग्रह किया गया है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या को स्थायी रूप से 543 ही बनाए रखा जाए. तमिलनाडु सरकार के इस कदम ने देश में केंद्र-राज्य संबंधों, राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और 2029 के चुनावी समीकरणों पर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है.
संसद में संतुलन और परिसीमन की चिंताएं
विधानसभा में पेश किए गए प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा और राज्यसभा की सीटों का अनुपात 2.2:1 बनाए रखने की मांग की गई है. इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य चिंता यह है कि यदि केवल आबादी को आधार बनाकर नया परिसीमन किया गया, तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में बेहतरीन काम किया है, संसद में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है. प्रस्ताव में स्पष्ट किया गया है कि जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीतियों का पालन करने वाले राज्यों के लोकतांत्रिक अधिकारों से कोई समझौता नहीं होना चाहिए.
2029 में ही 33% महिला आरक्षण लागू करने की मांग
प्रस्ताव का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा महिला आरक्षण से जुड़ा है. मुख्यमंत्री विजय ने जोर देकर कहा कि 2029 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण बिना किसी देरी के लागू किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यह आरक्षण मौजूदा 543 सीटों के आधार पर ही तुरंत दिया जाए और इसे परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़कर लटकाया न जाए. मुख्यमंत्री के अनुसार, महिलाओं को संसदीय प्रतिनिधित्व देना कोई राजनीतिक रियायत नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है.
राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव और विपक्षी गोलबंदी
इस कदम के बाद केवल तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि संपूर्ण दक्षिण भारत और कई अन्य राज्यों में परिसीमन के मापदंडों पर चर्चा तेज हो गई है. कांग्रेस सहित कई सहयोगी दलों ने महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग रखने की इस मांग का समर्थन किया है. दूसरी ओर, राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टियों (डीएमके और एआईएडीएमके) ने इस कदम को राजनीतिक पैंतरा करार दिया है.
यह घटनाक्रम अब एक प्रांतीय सीमा से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संघवाद (Federalism), आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व और चुनावी राजनीति के भविष्य का एक प्रमुख मुद्दा बन चुका है.


