- सदर अस्पताल के दो चिकित्सकों की लापरवाही पर डीसी ने जतायी नाराजगी, मांगी पूरी प्रकिया की रिपोर्ट
जमशेदपुर. जिले में पैर पसार रहे मलेरिया के जानलेवा प्रकोप ने एक बार फिर सरकारी दावों की पोल खोलकर रख दी है. धरातल पर स्वास्थ्य सेवाएं इस कदर दम तोड़ चुकी हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों में ताले लटके हुए हैं.
मलेरिया नियंत्रण अभियान में लगातार मिल रही घोर लापरवाही की शिकायतों के बाद अब जिले का पूरा स्वास्थ्य सिस्टम ही कटघरे में खड़ा नजर आ रहा है.
इस पूरे प्रशासनिक तंत्र के मुखिया होने के नाते अब सिविल सर्जन की भूमिका और उनकी निगरानी क्षमता पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर उनकी नाक के नीचे इतनी बड़ी लापरवाही कैसे चलती रही?
ताले लटके स्वास्थ्य केंद्र और नदारद डॉक्टर: सिस्टम हुआ पंगु
जिले के संवेदनशील इलाकों में जब मलेरिया से गरीब जनता त्रस्त है, तब स्वास्थ्य केंद्र बंद पड़े हैं. हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद प्रशासनिक समीक्षा में यह बात सामने आई है कि कई क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह बंद पाए गए.
नियमों के मुताबिक, किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को मुस्तैद रहना था, लेकिन सिस्टम की ढिठाई देखिए कि बिना किसी पूर्व सूचना या छुट्टी स्वीकृत कराए चिकित्सा पदाधिकारी अपने कर्तव्य स्थल से गायब हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जिले के स्वास्थ्य महकमे के सर्वोच्च अधिकारी यानी सिविल सर्जन का अपने मातहतों पर क्या नियंत्रण है?
कागजी कार्रवाई और नोटिस का खेल, धरातल पर मौत का तांडव
मलेरिया के बढ़ते आंकड़ों पर काबू पाने में नाकाम स्वास्थ्य विभाग अब केवल ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी करने तक सीमित रह गया है. हालांकि पोटका के प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी को निलंबित किया गया है और सदर अस्पताल के दो डॉक्टरों को नोटिस थमाया गया है, लेकिन इससे स्वास्थ्य व्यवस्था की सेहत सुधरती नहीं दिख रही है.
जिले के पोटका, चाकुलिया, घाटशिला और डुमरिया जैसे ब्लॉक मलेरिया के नए हॉटस्पॉट बन चुके हैं. जांच में लगातार पॉजिटिव मरीज मिल रहे हैं, लेकिन उन्हें समय पर इलाज और दवाइयां नहीं मिल पा रही हैं.
निजी अस्पतालों पर ठीकरा फोड़ने की कोशिश?
अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए अब विभाग द्वारा निजी अस्पतालों, क्लीनिकों और नर्सिंग होम को 24 घंटे के भीतर मलेरिया मरीजों की सूचना देने का कड़ा फरमान सुनाया गया है. जानकारों का कहना है कि जब सरकारी सिस्टम खुद घर-घर जाकर रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट (RDT) करने और एंटी-लार्वा का छिड़काव करने में पूरी तरह फेल साबित हुआ है, तब इस तरह के आदेश केवल अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने जैसे हैं.
यदि समय रहते इस चरमराते स्वास्थ्य सिस्टम को नहीं सुधारा गया और प्रभावित इलाकों में युद्ध स्तर पर काम नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है. जनता अब सीधे तौर पर इस पूरी बदहाली के लिए मुख्य चिकित्सा प्राधिकारी यानी सिविल सर्जन की जवाबदेही तय करने की मांग कर रही है.
डीसी की सीधी निगरानी, डॉक्टरों के स्पष्टीकरण पर मांगा जवाब
सोमवार को उच्चस्तरीय बैठक में उपायुक्त (डीसी) राजीव रंजन ने सदर अस्पताल के डॉक्टरों की लापरवाही और जारी स्पष्टीकरण (शोकॉज) की पूरी प्रक्रिया पर सीधी नजर रखने की बात कही. बैठक में यह बात सामने आई कि सदर अस्पताल के दो चिकित्सकों ने कर्तव्य के प्रति गंभीर लापरवाही बरती थी. रिपोर्ट के अनुसार, रात में भर्ती एक गंभीर बच्ची की हालत बिगड़ने पर नर्स द्वारा लगातार अवगत कराने के बावजूद दोनों चिकित्सक सुबह तक उसे देखने नहीं पहुंचे.
इस घोर संवेदनहीनता पर संज्ञान लेते हुए डीसी राजीव रंजन ने दोनों चिकित्सकों से तत्काल स्पष्टीकरण (शोकॉज) जारी कर जवाब तलब करने का निर्देश दिया था. डीसी ने स्पष्ट किया है:
स्वास्थ्य सेवाओं में इस तरह की जानलेवा लापरवाही अक्षम्य हैं दोनों डॉक्टरों के स्पष्टीकरण का अध्ययन मैं स्वयं कर रहा हूं. यदि उनका जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो उनके खिलाफ निलंबन और विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा सीधे मेरे कार्यालय से राज्य मुख्यालय को भेजी जाएगी. — राजीव रंजन, उपायुक्त
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